मुख्यपृष्ठस्तंभमेगा-प्लान : मुंबई को ईवी क्रांति की जरूरत ...प्रदूषण, ट्रैफिक और पेट्रोल-डीजल...

मेगा-प्लान : मुंबई को ईवी क्रांति की जरूरत …प्रदूषण, ट्रैफिक और पेट्रोल-डीजल निर्भरता से मुक्ति का रास्ता

अनिल तिवारी
मुंबई

पूर्वार्ध
मुंबई में बढ़ते प्रदूषण, ट्रैफिक और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता ने शहरी जीवन को गंभीर चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। ऐसे में इलेक्ट्रिक वेहिकल (ईवी) को अपनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य समाधान बनता जा रहा है।

मुंबई जैसे महानगर के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है—प्रदूषण, ईंधन की बर्बादी और अनियंत्रित वाहन-भार। यह शहर देश की आर्थिक राजधानी है, लेकिन इसकी सड़कें हर दिन लाखों वाहनों के दबाव, ट्रैफिक जाम, धीमी गति और जहरीले धुएं से कराहती हैं। मुंबई में वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। शहर में निजी वाहनों, टैक्सियों, ऑटोरिक्शा, बसों, टेंपो, ट्रकों, टू-व्हीलर्स और ऐप-आधारित कैब सेवाओं का दबाव इतना अधिक है कि केवल सड़कें चौड़ी करने, फ्लाईओवर बनाने या सिग्नल स्मार्ट करने से समस्या पूरी तरह हल नहीं हो सकती। समस्या की जड़ में पेट्रोल और डीजल आधारित परिवहन व्यवस्था भी है। मुंबई को प्रदूषण से बड़ी राहत दिलानी है तो इलेक्ट्रिक वेहकिल यानी ईवी क्रांति को केवल विकल्प नहीं, बल्कि नीति का केंद्रीय आधार बनाना होगा।
आर्थिक सुरक्षा भी
आज पेट्रोल और डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआं, कार्बन उत्सर्जन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, पार्टिकुलेट मैटर और ध्वनि प्रदूषण शहर की हवा को लगातार खराब कर रहे हैं। ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े वाहन, जाम में फंसी बसें, धीमी रफ्तार से चलती डीजल टैक्सियां, भारी मालवाहक वाहन और दिनभर खड़ी रहकर डीजल जलाने वाली वैनिटी वैन—ये सब मिलकर शहर की सांसों पर बोझ बनते जा रहे हैं।
मुंबई में समस्या केवल वाहनों की संख्या नहीं है, बल्कि वाहनों का ईंधन-स्वरूप भी है। जब लाखों वाहन रोजाना पेट्रोल और डीजल जलाते हैं, तो उसका असर केवल हवा पर नहीं, देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। तेल आयात के कारण विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार, भारत के तेल आयात से हर महीने अरबों डॉलर का व्यापारिक बोझ जुड़ता है और कच्चे तेल के दाम बढ़ने पर रुपये पर भी दबाव आता है। इसलिए ईवी क्रांति केवल पर्यावरण की मांग नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा की भी जरूरत है। सरकार को चाहिए कि वह चरणबद्ध तरीके से डीजल कारों का उत्पादन घटाने और अंतत: सीमित करने की स्पष्ट नीति बनाए। ऑटोमोबाइल कंपनियों को यह संकेत साफ मिलना चाहिए कि भविष्य इलेक्ट्रिक वाहनों का है। कंपनियों को केवल बाजार की मांग के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जब तक नीति स्पष्ट और कठोर नहीं होगी, तब तक कई कंपनियां पेट्रोल-डीजल वाहनों से होने वाले तात्कालिक लाभ के कारण ईवी में पर्याप्त निवेश नहीं करेंगी। भारत में लंबे समय तक कार सेगमेंट में ईवी का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हुआ। २०२५ में भारत में कुल ईवी बिक्री २२ लाख से अधिक पहुंची, लेकिन पैसेंजर वेहिकल यानी कार सेगमेंट में ईवी हिस्सेदारी अभी भी लगभग ४ प्रतिशत के आसपास रही। इसका अर्थ है कि दोपहिया और तिपहिया सेगमेंट में बदलाव दिख रहा है, लेकिन कार सेगमेंट में अभी लंबा रास्ता बाकी है।
मुंबई जैसे शहर के लिए सबसे पहले सार्वजनिक परिवहन को इलेक्ट्रिक बनाना होगा। बेस्ट बसों को पूरी तरह ईवी में बदलना एक निर्णायक कदम हो सकता है। मुंबई में बेस्ट ने अपने बेड़े में इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ाने और भविष्य में बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक बसें लाने का लक्ष्य रखा है। रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई में बेस्ट के लिए हजारों ई-बसों की योजना पर काम हो रहा है। यह सही दिशा है, लेकिन इसे समयबद्ध, पारदर्शी और तेजी से लागू करना होगा। साथ ही, मुंबई के आसपास के पूरे क्षेत्र—मुंबई महानगरीय क्षेत्र के तमाम बस प्राधिकरणों को भी तेजी से इसी दिशा में काम करना होगा।
ग्रीन मोबिलिटी जोन
सरकार को सभी सरकारी वाहनों को इलेक्ट्रिक में बदलना चाहिए। केंद्र सरकार, राज्य सरकार, महानगरपालिका, पुलिस, प्रशासनिक विभाग, सार्वजनिक उपक्रम और सरकारी एजेंसियों के वाहन चरणबद्ध ढंग से इलेक्ट्रिक किए जाएं। सरकार यदि खुद ईवी अपनाएगी, तभी निजी क्षेत्र पर उसका नैतिक और प्रशासनिक दबाव बनेगा। सभी कॉर्पोरेट हाउस को भी अपनी कंपनी कारों, कर्मचारी परिवहन वाहनों और लॉजिस्टिक वाहनों में इलेक्ट्रिक विकल्प अपनाने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। बड़ी कंपनियों के लिए यह केवल कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी नहीं, बल्कि शहरी उत्तरदायित्व का विषय होना चाहिए। ओला, उबर और अन्य ऐप-आधारित वैâब सेवाओं के लिए भी स्पष्ट नियम बनने चाहिए। पहले चरण में नई पंजीकृत वैâब केवल इलेक्ट्रिक हों। दूसरे चरण में पेट्रोल-डीजल वैâबों को समयसीमा देकर ईवी या सीएनजी में बदला जाए। ऐप-आधारित वैâब दिनभर शहर में चलती हैं, इसलिए उनका ईंधन-प्रभाव निजी कारों से अधिक होता है। इसी तरह ऑटोरिक्शा और टैक्सियों को भी चरणबद्ध रूप से इलेक्ट्रिक में बदलना चाहिए। मुंबई में यदि ई-रिक्शा, ई-टैक्सी और ई-कैब नेटवर्क मजबूत हो जाए, तो शहर के प्रदूषण में बड़ा अंतर दिखाई देगा।
एक और क्षेत्र है—एविएशन। हवाई अड्डों पर भी बड़ा बदलाव संभव है। एयरपोर्ट पर यात्री परिवहन, विमान रखरखाव, कार्गो हैंडलिंग, बैगेज ट्रॉली, एयरसाइड बसें, सुरक्षा वाहन और ग्राउंड सपोर्ट उपकरण लंबे समय तक सीमित क्षेत्र में चलते हैं। इन्हें इलेक्ट्रिक बनाना तकनीकी दृष्टि से आसान है, क्योंकि इनके रूट तय होते हैं और चार्जिंग स्टेशन एयरपोर्ट परिसर में ही लगाए जा सकते हैं। मुंबई एयरपोर्ट और नई मुंबई एयरपोर्ट जैसे बड़े केंद्रों को पूरी तरह ग्रीन मोबिलिटी जोन बनाया जा सकता है। इसी के साथ सड़कों पर लाखों की संख्या में चलने वाले छोटे मालवाहक वाहनों पर भी गंभीरता से काम करना होगा। थ्री-व्हीलर टेंपो, फोर-व्हीलर टेंपो, छोटे ट्रक, डिलिवरी वैन, ई-कॉमर्स वाहन और मंझले मालवाहक वाहन शहर के अंदर बहुत चलते हैं। इनमें से बहुत-से वाहनों को इलेक्ट्रिक में बदला जा सकता है। जिन भारी वाहनों को तत्काल इलेक्ट्रिक में बदलना व्यावहारिक न हो, उन्हें सीएनजी या अन्य स्वच्छ ईंधन में परिवर्तित किया जाना चाहिए। अंतिम लक्ष्य यह हो कि शहर के अंदर डीजल आधारित मालवाहक वाहन न्यूनतम रह जाएं। टूर्स एंड ट्रैवल्स की बसों को भी इलेक्ट्रिक करना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि उनके रूट, स्टॉप और पार्किंग स्थल तय होते हैं। यदि मुंबई से शिर्डी, पुणे, नासिक, गुजरात, गोवा या अन्य मार्गों पर चलने वाली बसों के लिए मार्ग-आधारित चार्जिंग नेटवर्क बने, तो डीजल बसों पर निर्भरता तेजी से घट सकती है। इसी तरह स्कूल बसों, कंपनी बसों और स्टाफ ट्रांसपोर्ट को भी ईवी में बदलने का समय आ गया है।
ईवी क्रांति का इकोसिस्टम
एक विशेष क्षेत्र है-बॉलीवुड और विज्ञापन-शूटिंग उद्योग। शूटिंग में इस्तेमाल होने वाली वैनिटी वैन अक्सर दिनभर एक ही जगह खड़ी रहकर डीजल जेनरेटर चलाती हैं। इससे स्थानीय प्रदूषण और शोर दोनों बढ़ते हैं। मुंबई में सभी वैनिटी वैन को चरणबद्ध रूप से इलेक्ट्रिक या बैटरी-सपोर्टेड बनाया जाना चाहिए। शूटिंग स्थलों पर मोबाइल चार्जिंग यूनिट और बैटरी बैंक की व्यवस्था हो सकती है। यह फिल्म उद्योग को भी पर्यावरण-अनुकूल छवि देगा। हो सकता है कि पेट्रोल-डीजल से मिलने वाले कर-राजस्व के कारण सरकारें ईवी परिवर्तन की गति को लेकर सावधान रहती हों। भारत में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज, सेस और वैट सरकारों के लिए महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत हैं। विश्लेषणों में यह भी बताया गया है कि ईवी संक्रमण से ईंधन कर-राजस्व पर असर पड़ सकता है। लेकिन नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि ईंधन कर से मिलने वाला लाभ अल्पकालिक है, जबकि तेल आयात घटने, प्रदूषण कम होने, स्वास्थ्य खर्च घटने और ऊर्जा सुरक्षा बढ़ने का लाभ दीर्घकालिक है।
संक्षेप में कहें तो मुंबई को ईवी क्रांति के लिए केवल वाहन नीति नहीं, बल्कि पूरा इकोसिस्टम चाहिए—चार्जिंग स्टेशन, बैटरी स्वैपिंग, पार्किंग में चार्जिंग, सोसायटी चार्जिंग नियम, फ्लीट वित्तपोषण, पुराने वाहनों के स्व्रैâपेज प्रोत्साहन और स्थानीय स्तर पर ईवी सर्विसिंग नेटवर्क। यदि यह सब नीति का हिस्सा बने, तभी मुंबई सचमुच स्वच्छ, शांत और आधुनिक परिवहन वाला शहर बन सकेगी।
जारी…

अन्य समाचार