सूफी खान
कहां तो राष्ट्रपति ट्रंप प्रधानमंत्री नेतन्याहू की दोस्ती और इजरायल के खातिर ईरान में इस्लामिक रिवॉल्यूशन को पलटने निकले थे। इस साल फरवरी के आखिर में हमला किया, ईरानी सुप्रीम लीडर को कत्ल कर दिया, लेकिन ईरान में इस्लामिक रिवॉल्यूशन ज्यों का त्यों है। इसके उलट, महज नौ महीने बाद प्रधानमंत्री नेतन्याहू सत्ता तक नहीं पहुंच पाए। वहां मुसलमानों की अरब पार्टियां सत्ता की चाबी लेकर बैठ गई हैं और अमेरिका में ट्रंप के हाथ से भी सत्ता की ताकत निकल गई। वे वीटो पावर का डर जरूर दिखा रहे हैं, लेकिन ईरान से पंगा लेना ही उनकी पार्टी को मिडटर्म चुनाव में ले डूबा।
जनवरी २०२६ में तो ट्रंप ने ईरान के लोगों से अपनी सरकार पर कब्जा करने तक की अपील कर दी थी। प्रधानमंत्री नेतन्याहू भी लगातार ईरान की मौजूदा व्यवस्था को खत्म करने की बात करते रहे, लेकिन दोनों की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। इमाम खामेनेई की मौत के बावजूद ईरान नहीं हिला, मगर इजरायल और अमेरिका की सत्ता जरूर हिल गई। इजरायल और अमेरिका की जनता इसी सवाल के साथ वोट देने पहुंची थी कि हमें जंग में क्यों झोंका? हम पर महंगाई का बोझ क्यों थोपा? इसका असर चुनावी नतीजों के रूप में साफ दिखाई दिया। जनवरी २०२६ के ईरान के महंगाई विरोधी प्रदर्शनों को ट्रंप ने सत्ता परिवर्तन के मौके के रूप में देखा। उनकी सरकार ने प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए ईरानी अधिकारियों को निशाना बनाने पर विचार किया। यहां तक कि ४० दिनों तक जंग भी कर डाली, लेकिन हासिल हुई सिर्फ और सिर्फ हार। मध्य-पूर्व में अमेरिका के पैर उखड़ गए। इजरायल में नेतन्याहू की पार्टी सत्ता में नहीं आ पा रही है और इधर ट्रंप की ताकत भी घट गई है। अब दो साल जैसे-तैसे अमेरिका का निजाम चलेगा। डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस और सीनेट अगर जंग के लिए बजट ही जारी नहीं करेंगी, तो लड़ेंगे किससे और वैâसे?
युद्ध के दौरान ट्रंप और नेतन्याहू ने अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन तो किया, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आया कि किसी देश के नेता को मार देना और उसकी पूरी राजनीतिक व्यवस्था को बदल देना दो अलग-अलग बातें हैं। ईरान में सत्ता का आधार केवल खामेनेई नहीं, बल्कि धार्मिक संस्थाओं, सुरक्षा बलों और ताकतवर इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के हाथों में भी माना जाता है। यही वजह रही कि नेतृत्व को बड़ा झटका लगने के बावजूद व्यवस्था नहीं टूटी। वहीं युद्ध की कीमत, आर्थिक दबाव और राजनीतिक पैâसलों को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू को अपने ही देशों में सवालों का सामना करना पड़ रहा है। इजरायल के २७ अक्टूबर के चुनाव में नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से दूर रह गया है। अमेरिका में ट्रंप की पार्टी की मिडटर्म चुनाव में हार पर ईरान ने सिर्फ इतना ही कहा कि अंतरात्मा की आवाज हो या महंगाई का बोझ, अमेरिकियों ने जंग के खिलाफ वोट दिया है। हम उनके इस संदेश का समर्थन करते हैं। अगर अमेरिकी सरकार अंतरराष्ट्रीय आकाओं और ब्लैकमेल करने वालों के हितों की सेवा के लिए अपने ही नागरिकों की इच्छा के साथ विश्वासघात करती है, तो उसे इसका ऐसा खौफनाक अंजाम भुगतना पड़ेगा, जिसे वह कभी भूल नहीं पाएगी।
