-अशनीर ग्रोवर का सरकार पर हमला-‘अफोर्ड कर सकते हैं तो सांस लेने के भी ५०० ले लो’
यूपीआई के जरिए २,००० रुपए से अधिक के मर्चेंट भुगतान पर एमडीआर लगाए जाने के फैसले को लेकर भारतपे के पूर्व सह-संस्थापक अशनीर ग्रोवर ने सरकार पर तीखा हमला किया है। ग्रोवर का कहना है कि इसे मर्चेंट डिस्काउंट रेट या सेवा शुल्क जैसे तकनीकी नामों के पीछे छिपाने के बजाय सीधे ‘टैक्स’ कहा जाना चाहिए।
ग्रोवर के मुताबिक, सरकार यह कह सकती है कि शुल्क ग्राहक से नहीं, व्यापारी से लिया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता में व्यापारी अपनी जेब से इसका बोझ नहीं उठाएगा। वह इस अतिरिक्त लागत को किसी न किसी रूप में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में शामिल करेगा। इस तरह शुल्क व्यापारी के रास्ते घूमकर अंततः सामान्य ग्राहक से ही वसूला जाएगा। उन्होंने सरकार के ‘यह शुल्क वहन करने योग्य है’ वाले तर्क पर व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि किसी चीज को वहन कर पाने की क्षमता ही शुल्क लगाने का आधार है, तो फिर सांस लेने के भी ५०० रुपए वसूल लिए जाने चाहिए, क्योंकि लोग उसे भी किसी तरह चुका देंगे। ग्रोवर का तर्क है कि यूपीआई को व्यापक सफलता इसलिए मिली क्योंकि यह आसान, तत्काल और शुल्क-मुक्त भुगतान माध्यम था। दुकानदार और ग्राहक दोनों बिना किसी अतिरिक्त लागत की चिंता किए इसका इस्तेमाल करते थे। अब यदि बड़े भुगतान पर व्यापारी को शुल्क देना पड़ेगा तो वह ग्राहक को नकद देने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है अथवा डिजिटल भुगतान स्वीकार करने से बच सकता है।
नकद लेन-देन को मिलेगा बढ़ावा
उनके अनुसार, इससे सरकार के डिजिटल भुगतान और नकदरहित अर्थव्यवस्था के अभियान को नुकसान पहुंच सकता है। व्यापारी २,००० रुपए से अधिक की खरीद पर नकद मांग सकते हैं या भुगतान को छोटे हिस्सों में बांटने का रास्ता अपना सकते हैं। इसका परिणाम यह होगा कि जिस नकद अर्थव्यवस्था को कम करने के लिए यूपीआई को बढ़ावा दिया गया था, वही दोबारा मजबूत होने लगेगी।
पहले आदत डालो फिर शुल्क वसूलो की नीति
ग्रोवर का मूल सवाल है कि सरकार पहले किसी सुविधा को मुफ्त रखकर करोड़ों लोगों की आदत बनाती है और व्यापक स्वीकार्यता मिलने के बाद उस पर शुल्क क्यों लगा देती है? उनके मुताबिक यूपीआई केवल भुगतान प्रणाली नहीं, देश का सार्वजनिक डिजिटल ढांचा बन चुका है। ऐसे में इसके रखरखाव का खर्च व्यापारी और परोक्ष रूप से ग्राहक पर डालना उचित नहीं है। उनका स्पष्ट मत है कि यूपीआई को पहले की तरह पूरी तरह शुल्क-मुक्त रखा जाना चाहिए।
