मुख्यपृष्ठस्तंभहल्का-फुल्का: केडीएमसी की ईमानदारी को शत-शत नमन!

हल्का-फुल्का: केडीएमसी की ईमानदारी को शत-शत नमन!

एम एम एस

कल्याण और डोंबिवली की पावन धरा पर दुनिया भर के अवैध निर्माण ऐसे सीना ताने खड़े हैं, जैसे वह सीधे स्वर्ग से एनओसी लेकर आए हों। ऐसा नहीं है कि हमारी केडीएमसी इन चमचमाती अवैध इमारतों, पैâक्ट्रियों, रिहायशी बिल्डिंगों, रसूखदार बीयर बारों या आलीशान रिसॉर्ट्स से वाकिफ नहीं है। वाकिफ तो वो हर एक ईंट से है! लेकिन साहब, प्रशासन का एक सीधा नियम है, ‘जाको राखे हुकमरान, मार सके न कोई’ और ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’। बाकी जनता तो सिर्फ दूध दुहने के लिए है।
अवैध निर्माणों का सफाया होना ही चाहिए, बिल्कुल होना चाहिए! लेकिन गजब की क्रोनोलॉजी देखिए। जब ये अवैध इमारतें कुकुरमुत्तों की तरह उग रही होती हैं, तब प्रशासन कुंभकर्णीय नींद का आनंद ले रहा होता है। तब शायद ‘गंगू तेली’ की तरह फाइलें धीरे-धीरे सरकती हैं। लेकिन जैसे ही भाइयों के आपसी बंटवारे में ‘राजनीतिक रसूख’ का तड़का लगता है, प्रशासन की सोई हुई आत्मा अचानक ‘बाहुबली’ बनकर जाग उठती है।
और निशाना कौन बना? एक स्कूल! जहां मासूम बच्चों को ईमानदारी और कानून का पाठ पढ़ाया जाता है। केडीएमसी ने सोचा होगा, जब पाठ ही ईमानदारी का है, तो प्रैक्टिकल भी सबसे पहले यहीं होना चाहिए!
कमाल का टाइमिंग सेंस है! नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, बच्चे क ख ग घ की किताबें खोलकर बैठे ही थे कि बाहर केडीएमसी के बुलडोजर ने ‘क’ से ‘कार्रवाई’ का अंग्रेजी में ‘ए’ फॉर एक्शन लाइव डेमो दे दिया। १,२०० विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है। अभिभावक रो रहे हैं, गुहार लगा रहे हैं कि कम से कम एक साल की मोहलत दे दो, ताकि बच्चों का साल खराब न हो।
लेकिन डिजिटल इंडिया के इस दौर में प्रशासन को ‘भविष्य’ की चिंता करने की क्या जरूरत? क्या हुआ जो बच्चों के पास आगे पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं है? केडीएमसी ने शायद मान लिया है कि मलबे पर बैठकर पढ़ना ही असली ‘ग्राउंड रियलिटी’ से रूबरू होना है। मासूम बच्चों की पढ़ाई की बलि चढ़ाने को आतुर, इस अद्भुत प्रशासनिक कला को इतिहास हमेशा याद रखेगा!

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