-भारत की चुप्पी पर सवाल
चीन लगातार तिब्बत की अनूठी संस्कृति, भाषा और पहचान को मिटाने के कुत्सित प्रयासों में जुटा हुआ है। हाल ही में गोलोग क्षेत्र में तीन और तिब्बती स्कूलों को बंद कर दिए जाने की खबर ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि बीजिंग सरकार तिब्बती-भाषा की शिक्षा पर किस हद तक नकेल कस रही है। तिब्बत के पारंपरिक शिक्षण संस्थानों को योजनाबद्ध तरीके से खत्म किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी मातृभाषा और संस्कृति से पूरी तरह कट जाएं।
तिब्बत पर चीन का कहर
तिब्बत में चीन का दमन चक्र केवल स्कूलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तिब्बती जीवन के हर पहलू को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। चीन तिब्बतियों को उनकी मातृभाषा में पढ़ने से रोक रहा है और सरकारी स्कूलों में अनिवार्य रूप से मंदारिन (चीनी) भाषा थोप रहा है। इसके अलावा, हजारों तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से दूर जबरन औपनिवेशिक शैली के ‘बोर्डिंग स्कूलों’ में भेजा जा रहा है, जहां उन्हें उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से काट दिया जाता है। तिब्बती मठों पर कड़े प्रतिबंध, धार्मिक नेताओं का उत्पीड़न और मानवाधिकारों का हनन इस बात का प्रमाण है कि चीन तिब्बत की सांस्कृतिक पहचान को हमेशा के लिए मिटाना चाहता है।
भारत की चुप्पी पर सवाल
ऐसी गंभीर परिस्थितियों में भारत की भूमिका अत्यंत निराशाजनक रही है। तिब्बत भारत का प्रत्यक्ष पड़ोसी है और भारत में ही तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा और निर्वासित तिब्बत सरकार शरण लिए हुए हैं। इसके बावजूद, चीनी आक्रामकता और तिब्बत में ढहाए जा रहे सांस्कृतिक कहर पर भारतीय कूटनीति की चुप्पी कई बड़े सवाल खड़े करती है। एक ओर जहां भारत अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों को साधने के लिए फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है, वहीं मानवाधिकारों और एक प्राचीन संस्कृति के संरक्षण के वैश्विक मंच पर तिब्बत के पक्ष में मुखर न होना चिंता का विषय है। भारत को तिब्बत के सांस्कृतिक अस्तित्व को बचाने के लिए कूटनीतिक मोर्चे पर अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए, क्योंकि एक सुरक्षित तिब्बत ही भारत की उत्तरी सीमा की दीर्घकालिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
