अमिताभ श्रीवास्तव
आजकल बॉक्सिंग में सनसनी मचाने के लिए मुक्केबाज तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। अब देखिए न, बॉक्सर महमूद चार्र ने टायसन फ्यूरी को चुनौती दी है कि दम हो तो आ जा रिंग में। बॉक्सिंग का राजा फ्यूरी नहीं मैं हूं। मजे की बात यह कि ऐसा कहते हुए उसने एक वीडियो भी बनाया, जिसमें वो शेर के गले में पट्टा डाल बड़ी अकड़ के साथ चल रहा है। यह प्रचार का अपना एक तरीका है। महमूद, जिस पर जानलेवा हमला हुआ था और वो मरते-मरते बचा था, ने सालों फ्यूरी के साथ सोशल मीडिया पर प्रतिद्वंद्विता करते हुए अजीबोगरीब वीडियो तक बनाए, ताकि फ्यूरी चिढ़ जाए। लायन को पकड़े हुए मोहम्मद ने कहा कि मेरी चुनौती स्वीकार करो। मैं यूके आ रहा हूं। तुम्हारे चेहरे पर पंच मारने के लिए मैं तैयार हूं, पार्टनर। ज्यादा मत बोलो, कागज पर साइन करो। तुमने लोगों से वादा किया था। उधर फ्यूरी ने भी घोषणा की है कि वे इस साल रिंग में वापसी करेंगे। ब्रिटेन के दो बार के हैवीवेट वर्ल्ड चैंपियन थाईलैंड में अपनी नवीनतम वापसी के लिए इस समय ट्रेनिंग ले रहा है। महमूद को इस बीच उनके पिछले मुकाबले में दिसंबर २०२४ में कुब्रत पुलेव (४४) ने हराया था। लेबनानी मूल के हैवीवेट बॉक्सर महमूद पर जर्मनी के पश्चिमी हिस्से में एसेन की एक कबाब की दुकान पर ड्राइव-बाय शूटिंग का निशाना बना दिया गया था। इस हमले के बाद वह मरते-मरते बचा था। हमलावर यूसुफ हसन को ५ साल की सजा हुई, जबकि उसे कूल्हे के ऑपरेशन भी करवाने पड़े। महमूद नौ महीने बाद ही फिर से रिंग में लौट आया।
१३ साल बाद मिला क्रांति के पिता को न्याय
यह न्याय है या क्रिकेट में अपना जलवा दिखाने का कमाल या फिर राज्य को देशभर में विख्यात करने का इनाम। जी हां, क्रिकेटर क्रांति गौर के पिता को १३ साल बाद नौकरी में बहाल किया गया है। महिला क्रिकेट की सनसनी बनकर उभरी क्रांति के पिता मध्य प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल थे, उन्हें चुनाव ड्यूटी में लापरवाही के आरोप में सस्पेंड कर दिया गया था। यह पैâसला पूरे परिवार के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। नौकरी गई, हालात बिगड़े, लेकिन हिम्मत नहीं टूटी। मुन्ना सिंह की नौकरी जाने के बाद परिवार की आर्थिक हालत बुरी तरह डगमगा गई। गांव घुवारा में रहने वाला यह परिवार सालों तक संघर्ष करता रहा। आर्थिक तंगी, सामाजिक दबाव और लंबी कानूनी लड़ाई ने परिवार को तोड़ने की पूरी कोशिश की, लेकिन इसी दौर में क्रांति ने क्रिकेट को अपना सहारा बनाया। क्रांति ने बेहद सीमित संसाधनों में क्रिकेट की प्रैक्टिस शुरू की। कई बार हालात ऐसे रहे कि खेल छोड़ने का मन हुआ, लेकिन पिता का सपना और परिवार की जिम्मेदारी उन्हें आगे बढ़ाती रही। मेहनत रंग लाई और क्रांति ने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई। जब उन्होंने भारतीय महिला क्रिकेट टीम में जगह बनाई, तो पूरे गांव और प्रदेश में खुशी की लहर दौड़ गई। क्रांति के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के बाद मामला फिर से सुर्खियों में आया। इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हस्तक्षेप के बाद मुन्ना सिंह की फाइल दोबारा खोली गई। करीब १३ साल बाद राज्य सरकार ने उनका निलंबन खत्म करते हुए उन्हें फिर से सेवा में बहाल कर दिया। नौकरी बहाल होने की खबर जैसे ही परिवार तक पहुंची, भावनाएं छलक पड़ीं। जिस वर्दी को पहनने का सपना एक समय टूट गया था, वही वर्दी अब फिर से मुन्ना सिंह को वापस मिल गई। यह सिर्फ एक नौकरी की बहाली नहीं थी, बल्कि सालों के अपमान, संघर्ष और चुपचाप झेली गई तकलीफों का जवाब था। यह कहानी सिर्फ क्रांति गौर या उनके पिता की नहीं, बल्कि हर उस परिवार की है जो मुश्किल हालात में भी हार नहीं मानता। बेटी ने देश के लिए रन बनाए और पिता को इंसाफ मिला।
