हिमांशु राज
बहराइच की मुस्लिम बहुल मटेरा सीट से असदुद्दीन ओवैसी की हुंकार ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल ला दी है। एआईएमआईएम के सुप्रीमो ओवैसी ने मंच से सीधे अखिलेश यादव को ललकारते हुए पूछा कि अगर हम बीजेपी की बी टीम हैं तो पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के बीस सांसद तृणमूल छोड़कर बीजेपी में क्यों चले गए। यह प्रश्न एआईएमआईएम की राजनीतिक संतुलन बदलने की क्षमता का संकेत देता है।
ओवैसी ने साफ कर दिया है कि २०२७ में वो मुस्लिम समुदाय के लिए बराबर हिस्सेदारी और सम्मान के जरिए ही समर्थन मांगेंगे। उन्होंने बीजेपी को रोकने के लिए गठबंधन का तुरुप का इक्का फेंका है। ओवैसी का आक्रामक अंदाज और दलित-मुस्लिम सोशल इंजीनियरिंग अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले पर सीधे हमला है।
अखिलेश यादव को ओवैसी की एंट्री से तीन तरीकों से नुकसान होगा। सबसे पहले मुस्लिम वोटों का विभाजन। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग पंद्रह फीसदी है और ये वोट परंपरागत रूप से सपा को मिलते हैं। ओवैसी की सोशल इंजीनियरिंग से मुस्लिम वोट एआईएमआईएम और सपा के बीच बंटेंगे। दूसरा दलित वोटों पर असर। यदि ओवैसी दलित वोटों को खींचने में सफल रहे तो अखिलेश यादव का मुख्य वोट बैंक कमजोर होगा। तीसरा गठबंधन की ताकत घटेगी। ओवैसी की एंट्री से पीडीए गठबंधन बिखर सकता है क्योंकि छोटी पार्टियां एआईएमआईएम के साथ जुड़ने की संभावना रखती हैं।
ओवैसी की राजनीति ध्रुवीकरण की संभावनाएं बढ़ा सकती है, लेकिन इसका फायदा बीजेपी को मिलने की संभावना अधिक है। हालांकि, यदि एआईएमआईएम दलित-मुस्लिम गठजोड़ में सफल रहा तो यह बीजेपी के लिए खतरा बन सकता है। २०२७ के चुनाव में ओवैसी मुख्यत: सपा-कांग्रेस गठबंधन का खेल बिगाड़ सकते हैं क्योंकि वे मुस्लिम वोटों को विभाजित कर गठबंधन की पकड़ कमजोर कर देंगे। साथ ही यदि वे स्थानीय स्तर पर मजबूत दलित-मुस्लिम गठजोड़ बनाते हैं तो वे बीजेपी के खेल को भी चुनौती दे सकते हैं।
डिडी के कथित प्राइवेट टेप पर फिर हंगामा
अमेरिकी रैपर और संगीत जगत के चर्चित नाम शॉन ‘डिडी’ कॉम्ब्स एक बार फिर विवादों के तूफान में घिर गए हैं। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि उनसे जुड़े कथित ‘फ्रीक ऑफ’ वीडियो ऑनलाइन फैल रहे हैं। हालांकि, इन वीडियो की प्रामाणिकता की अभी तक किसी स्वतंत्र या आधिकारिक स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है। इंटरनेट पर फैल रही हर क्लिप सच हो, यह जरूरी नहीं। डिडी से जुड़े इस कथित लीक में भी सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या यह सचमुच वास्तविक सामग्री है या केवल नाम और विवाद का फायदा उठाकर फैलाया गया नया डिजिटल तमाशा? मामले की संवेदनशीलता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि डिडी पहले से ही गंभीर कानूनी विवादों और यौन उत्पीड़न से जुड़े आरोपों का सामना कर चुके हैं। उनके मुकदमे के दौरान ‘फ्रीक ऑफ’ से जुड़े वीडियो, गवाहियों और आरोपों का उल्लेख अदालत में हुआ था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि महिलाओं पर दबाव बनाया गया, जबकि बचाव पक्ष ने इन घटनाओं को सहमति से हुई निजी गतिविधियां बताया था। अब कथित वीडियो के ऑनलाइन फैलने के दावे ने कानूनी और नैतिक दोनों सवालों को फिर हवा दे दी है।
