मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा : हंसी में नहीं, आंसुओं में परखी जाती है दोस्ती!

फलसफा : हंसी में नहीं, आंसुओं में परखी जाती है दोस्ती!

सना खान

लोगों को लगता है कि दोस्ती हंसी में बनती है और मजाक, यादों और साथ बिताए पलों में। पर सच यह है कि दोस्ती की असली पहचान खुशी में नही, मुश्किल समय में होती है। जब सब कुछ ठीक होता है, तो साथ देने वाले लोग बहुत होते हैं। लेकिन जब जिंदगी उलझती है तब वही लोग कम हो जाते हैं, जो सच में आपके होते हैं। सच्चा दोस्त वो नहीं होता जो हर दिन आपके साथ हो, सच्चा दोस्त वो होता है, जो आपके सबसे बुरे दिनों में भी आपके साथ खड़ा हो। कभी आपने महसूस किया है मुश्किल वक्त में कई लोग पूछते हैं, ‘सब ठीक है?’ लेकिन कुछ लोग होते हैं, जो बिना पूछे समझ जाते हैं
कि कुछ ठीक नहीं है। सच्ची दोस्ती शब्दों से नहीं चलती, वो समझ से चलती है, जहां हर बात कहनी न पड़े और हर खामोशी भी समझी जाए। लोगों को लगता है कि दोस्ती बराबरी की होती है। पर सच यह है सच्ची दोस्ती में कभी-कभी एक इंसान ज्यादा निभाता है और दूसरा बस उस निभाने को समझता है और यही समझ दोस्ती को मजबूत बनाती है। मुश्किल वक्त दोस्ती को तोड़ता नहीं, उसे साफ करता है। कौन साथ है और कौन सिर्फ साथ दिख रहा था, यह वही समय बताता है।
कुछ लोग आपके साथ रहते हैं जब तक सब आसान होता है। और कुछ लोग आपके साथ रहते हैं जब सब मुश्किल हो जाता है। और फर्क बस यहीं होता है दोस्ती और पहचान में। कभी-कभी हम दोस्त नहीं खोते हम बस यह समझ जाते हैं कि वो कभी थे ही नहीं। और उस पल दर्द कम नहीं होता, बस साफ हो जाता है। सच्चा दोस्त आपको समझाता नहीं, वो आपके साथ खड़ा रहता है। वो आपको बदलने की कोशिश नहीं करता वो आपको वैसे ही स्वीकार करता है जैसे भी आप हैं। और जब आप खुद को भी समझ नहीं पा रहे होते, तब वही दोस्त आपको आपके हिस्से की ताकत वापस याद दिलाता है और शायद जिंदगी का सबसे सच्चा फलसफा यही है हर साथ दोस्ती नहीं होता और हर दोस्त मुश्किल समय में साथ नहीं रहता। दोस्ती वही सच्ची होती है जो हालात बदलने पर भी न बदले।

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