सना खान
सुबह का समय था। मोबाइल स्क्रीन पर एक के बाद एक वीडियो सामने आ रहे थे-कहीं पुल गिरने की खबर, कहीं सड़क बह जाने की तस्वीरें, तो कहीं हाल की घटनाओं से जोड़कर किए जा रहे अलग-अलग दावे। कुछ ही घंटों में ये वीडियो हजारों लोगों तक पहुंच गए और चर्चा का विषय बन गए।
लेकिन जब रिश्तेदारों और परिचितों के बीच इन दावों की परतें खुलनी शुरू हुईं, तो तस्वीर कुछ और ही सामने आई। जांच में पता चला कि जिन वीडियो को हाल की घटनाओं से जोड़ा जा रहा था, उनमें से कई पुराने थे, जबकि कुछ को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया था।
यही नहीं, कुछ वीडियो ऐसे भी सामने आए जो देखने में बेहद वास्तविक लगे, लेकिन असल में वे कृत्रिम तकनीक यानी एआई की मदद से तैयार किए गए थे। एडिटिंग और डिजिटल टूल्स के जरिए उन्हें इस तरह पेश किया गया कि आम व्यक्ति के लिए सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल हो गया।
अंतर्राष्ट्रीय पैâक्ट-चेकिंग संस्था Aइझ् इaम्ू ण्पम्व् की रिपोर्ट्स भी इस खतरे की ओर इशारा करती हैं। इनके अनुसार, सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में ऐसा कंटेंट पैâलाया जा रहा है जो वास्तविकता से अलग एक काल्पनिक कहानी गढ़ता है और लोगों को भ्रमित करता है।
यह केवल एक-दो वीडियो की बात नहीं, बल्कि एक बढ़ती हुई प्रवृत्ति है-जहां सच्चाई से ज्यादा तेजी से भ्रम पैâलता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम हर वायरल दावे पर आंख बंद करके भरोसा कर सकते हैं?
जवाब साफ है-नहीं।
डिजिटल दौर में हर जानकारी को परखना, उसकी सच्चाई जानना और फिर उस पर विश्वास करना ही जिम्मेदार नागरिक होने की पहचान है। वरना, एक झूठा वीडियो न सिर्फ सोच को प्रभावित करता है, बल्कि समाज में अविश्वास की दीवार भी खड़ी कर देता है।
