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पॉलिटिका : अजीत सिंह के विरोधियों का जयंत के करीब आना  संयोग या सियासत?

-के.पी. मलिक

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिनका अर्थ तत्काल दिखाई नहीं देता। उनके मायने समय के साथ खुलते हैं। कुछ मुलाकातें तस्वीर का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि तस्वीर बदलने की तैयारी होती हैं। आज जयंत चौधरी के आसपास बनते नए राजनीतिक समीकरणों को इसी नजरिए से देखने की जरूरत है। टिकैत परिवार की बढ़ती नजदीकी, युद्धवीर सिंह की रालोद के संसदीय बोर्ड में एंट्री, राकेश टिकैत और गौरव टिकैत की जयंत चौधरी से मुलाकात और रालोद के दरवाजे पर दस्तक देते कुछ पुराने राजनीतिक चेहरे, क्या ये सब अलग-अलग घटनाएं हैं या किसी बड़ी राजनीतिक पटकथा के छोटे-छोटे दृश्य?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि चौधरी अजीत सिंह के राजनीतिक जीवन में जिन लोगों और राजनीतिक धाराओं का विरोध दिखाई देता रहा, उनमें से कई आज जयंत चौधरी के करीब क्यों आते नजर आ रहे हैं? क्या समय ने रिश्ते बदल दिए हैं? क्या राजनीतिक जरूरतों ने पुराने विरोध भुला दिए हैं? या फिर कोई ऐसी सियासी बिसात बिछ रही है, जिसकी पूरी तस्वीर अभी पर्दे के पीछे है और जिसके कुछ मोहरे ही धीरे-धीरे सामने लाए जा रहे हैं? राजनीति में संयोग होते हैं, लेकिन जब संयोग लगातार एक ही दिशा में दिखाई देने लगें तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
किसानों की राजनीति से अपनी पहचान बनाने वाले टिवैâत परिवार की सियासत में मुकाम हासिल करने की हसरत कोई नई बात नहीं है। पहले राकेश टिकैत और उसके बाद गौरव टिकैत के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी अटकलें लगती रही हैं। ऐसे में जयंत चौधरी के साथ टिकैत परिवार की बढ़ती नजदीकी को केवल एक सामान्य राजनीतिक संवाद मान लेना क्या पर्याप्त होगा? दरअसल, पिछले दिनों पूर्व मंत्री और रालोद नेता योगराज सिंह के पिता की पुण्यतिथि पर किसान यूनियन अध्यक्ष नरेश टिवैâत का पहुंचना भी कई संकेत देता है। तो क्या किसान आंदोलन की ताकत और चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत के बीच कोई नया पुल तैयार किया जा रहा है? और यदि ऐसा है तो इस पुल का अंतिम पड़ाव कहां है?
यही सवाल रालोद के भीतर बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों पर भी लागू होता है। चौधरी चरण सिंह के पुराने सहयोगी और उनके शिष्य माने जाने वाले के.सी. त्यागी द्वारा अपने पुत्र के लिए राजनीतिक संभावनाएं तलाशने की चर्चा हो या पूर्व सांसद मलूक नागर द्वारा अपने परिवार के सदस्य के लिए विधानसभा की राजनीति में जगह तलाशने की कोशिश, रालोद के आसपास राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का एक नया घेरा बनता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में इसमें और नाम जुड़ें तो शायद किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन असली सवाल नामों की संख्या नहीं बल्कि असली सवाल यह है कि इन लोगों को एक साथ लानेवाली राजनीतिक जरूरत क्या है?
क्या जयंत चौधरी पश्चिमी यूपी में अपनी पार्टी का विस्तार कर रहे हैं? या फिर उनकी पार्टी के विस्तार के नाम पर उनके आसपास ऐसा राजनीतिक घेरा तैयार हो रहा है, जिसका असर आगे चलकर रालोद की अपनी पहचान पर पड़ेगा? क्या यह जयंत की रणनीति है या जयंत के आसपास किसी और की रणनीति आकार ले रही है? यही वह बिंदु है, जहां कहानी सामान्य राजनीतिक गतिविधियों से निकलकर रहस्य की सीमा में प्रवेश करती है। किसी राजनीतिक दल को कमजोर करने के लिए हमेशा उसके सामने खड़े होना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी उसके भीतर प्रवेश करना, उसके आसपास प्रभावशाली चेहरों का जमावड़ा बढ़ाना और उसकी राजनीतिक दिशा को धीरे-धीरे प्रभावित करना कहीं अधिक प्रभावी रणनीति हो सकती है। क्या पश्चिमी यूपी में ऐसा ही कोई प्रयोग हो रहा है? इसका कोई प्रमाण सामने नहीं है, लेकिन घटनाओं की श्रृंखला इस सवाल को जन्म जरूर देती है। और यहां चौधरी अजीत सिंह की विरासत का सवाल भी जुड़ जाता है।
चौधरी अजित सिंह ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में पश्चिमी यूपी की राजनीति में अनेक विरोधियों का सामना किया। अजित सिंह ने रालोद में तमाम उतार चढ़ाव देखे, एक समय ऐसा भी था जब मुलायम सिंह की सरकार उनकी बैसाखी पर थी और एक समय ऐसा भी आया कि २०१७ में रालोद का एक मात्र विधायक जीता और वह भी सत्ताधारी दल में चला गया मगर अजीत सिंह विचलित नहीं हुए। उनकी राजनीति को समाप्त करने के तमाम प्रयास हुए, गठबंधन बदले, राजनीतिक मित्र बदले और विरोधियों के चेहरे भी बदलते रहे, लेकिन उन्होंने अपनी पार्टी की पहचान को लंबे समय तक कायम रखा। आज उनके बाद वही राजनीतिक विरासत जयंत चौधरी के हाथ में है। इसलिए सवाल यह नहीं कि जयंत के पास कौन आ रहा है; सवाल यह है कि कौन क्यों आ रहा है और उसके आने के बाद रालोद क्या बन रहा है।
यहां एक और दिलचस्प सवाल है। कि यदि अजीत सिंह के राजनीतिक विरोधियों में रहे कुछ चेहरे आज जयंत के करीब हैं तो क्या यह केवल बदलती राजनीति का स्वाभाविक परिणाम है? या फिर किसी को यह समझना चाहिए कि पिता के दौर के राजनीतिक विरोधी अब बेटे के दौर में सहयोगी क्यों बन रहे हैं? राजनीति में दुश्मनी स्थायी नहीं होती, लेकिन जब पुराने विरोधियों की वापसी एक साथ और एक ही राजनीतिक मंच की ओर होने लगे तो उसके पीछे की वजह जानना जरूरी हो जाता है।
जयंत चौधरी आज एनडीए का हिस्सा हैं। रालोद सत्ता के साथ है। दूसरी ओर टिकैत परिवार की राजनीतिक पहचान किसान आंदोलन से जुड़ी रही है। जो पिछले किसान आंदोलन के बाद कुछ कमजोर पड़ती दिखी है। दोनों के बीच बढ़ता संवाद इसीलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है। क्या यह किसान राजनीति के बिखरे प्रभावों को मजबूत करने और एक मंच पर लाने की कोशिश है? क्या २०२७ के लिए पश्चिमी यूपी में कोई नया सामाजिक समीकरण तैयार किया जा रहा है? या फिर यह समीकरण बनाते-बनाते कोई ऐसा खेल शुरू हो सकता है, जिसमें सबसे ज्यादा दबाव खुद जयंत चौधरी पर आए? यही वह सवाल है जिसका उत्तर अभी किसी के पास नहीं है।
संभव है कि सब कुछ बिल्कुल सामान्य हो। संभव है कि जयंत चौधरी अपनी राजनीतिक जमीन को व्यापक बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हों। संभव है कि टिवैâत परिवार भी अपनी राजनीतिक संभावनाओं के लिए नए रास्ते तलाश रहा हो। लेकिन यह भी संभव है कि इन सभी घटनाओं के पीछे एक ऐसी राजनीतिक आवश्यकता काम कर रही हो, जिसकी घोषणा अभी किसी ने नहीं की है। राजनीति की सबसे बड़ी पटकथाएं अक्सर प्रेस विज्ञप्ति से नहीं, छोटे-छोटे संकेतों से लिखी जाती हैं।
एक मुलाकात होती है। फिर एक राजनीतिक नियुक्ति होती है। फिर कोई पुराना विरोधी अचानक करीब और कोई बरसों पुराना करीबी दूर दिखाई देता है। फिर टिकट की चर्चा शुरू होती है। फिर कोई नया चेहरा रालोद के दरवाजे पर दिखाई देता है। और जब ये सारे दृश्य एक ही दिशा में बढ़ने लगें तो सवाल उठता है कि क्या हम किसी बड़ी सियासी स्टोरी की शुरुआत देख रहे हैं? २०२७ का चुनाव अभी थोडा दूर है, लेकिन पश्चिमी यूपी में उसकी जमीन तैयार होने लगी है। किसान वोट, जाट राजनीति, चौधरी चरण सिंह की विरासत, रालोद की पहचान और टिकैत परिवार की संभावित राजनीतिक भूमिका, इन सबको अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। असली खेल इन्हीं धागों को जोड़ने में है।
इसलिए सबसे बड़ा सवाल अब यह नहीं कि राकेश टिकैत और गौरव टिकैत जयंत चौधरी से क्यों मिले। सवाल यह है कि इस मुलाकात के बाद अगली मुलाकात किससे होगी? अगला चेहरा कौन होगा? अगला टिकट किसे मिलेगा? और अगला राजनीतिक कदम किस दिशा में उठेगा? अगर यह सब महज संयोग है तो आनेवाले समय में तस्वीर साफ हो जाएगी। लेकिन अगर इसके पीछे कोई सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है तो उसके संकेत भी धीरे-धीरे सामने आएंगे। और तब शायद आज की ये छोटी-छोटी घटनाएं एक बड़ी तस्वीर का हिस्सा दिखाई देंगी।
क्योंकि पश्चिमी यूपी की सियासत में इस समय सिर्फ रिश्ते नहीं बदल रहे, राजनीतिक समीकरणों की दिशा भी बदलती दिखाई दे रही है। सवाल जयंत चौधरी के मजबूत होने या नहीं होने का नहीं बल्कि उनके चारों ओर बनते राजनीतिक घेरे का है। सवाल यह भी है कि यह घेरा उनके लिए सुरक्षा कवच है या धीरे-धीरे कसता हुआ सियासी फंदा? फिलहाल, पर्दा गिरा हुआ है। किरदार सामने हैं, लेकिन पटकथा दिखाई नहीं दे रही। २०२७ से पहले पश्चिमी यूपी में कौन किसके साथ खड़ा होगा, कौन किसके करीब आएगा और किसकी राजनीतिक जमीन किसके लिए तैयार की जाएगी, यही आनेवाले समय की सबसे बड़ी कहानी होगी और हो सकता है कि आज जिन मुलाकातों को हम सामान्य समझ रहे हैं, कल वही पश्चिमी यूपी की राजनीति के सबसे बड़े सियासी संकेत साबित हों। कहानी अभी अधूरी है। बिसात बिछ चुकी है और मोहरे चले जा चुके हैं। पटकथा लिखी जा रही है बस पर्दा उठना बाकी है।

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