के.पी. मलिक
पश्चिम बंगाल में आखिरी चरण की वोटिंग के साथ चुनावी शोर थम चुका है, लेकिन जो खामोशी अब पसरी है, वह सामान्य नहीं है। यह उस बड़े राजनीतिक पैâसले से पहले की खामोशी है, जो सिर्फ एक राज्य की सरकार तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी संकेत देगा कि आनेवाले वर्षों में भारत की राजनीति किस दिशा में मुड़ेगी। इस बार बंगाल का चुनाव पारंपरिक अर्थों में ‘कौन जीतेगा’ का सवाल नहीं रहा। यह चुनाव अपने भीतर कई गहरे और असहज सवाल समेटे हुए है कि क्या भारत में चुनाव अब भी उतने ही निष्पक्ष और संतुलित हैं, जितना हम मानते हैं? क्या क्षेत्रीय नेतृत्व अपनी जमीन बचा पाएगा या राष्ट्रीय राजनीतिक मशीनरी के सामने धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगा? और सबसे अहम, क्या लोकतंत्र का स्वरूप बदल रहा है?
सोच के फर्क का असर
दरअसल, सतह पर यह लड़ाई ममता बनर्जी बनाम भाजपा के रूप में दिखाई दी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल रही। ममता बनर्जी, जो पिछले एक दशक से बंगाल की राजनीति का केंद्र हैं, इस बार सिर्फ सत्ता बचाने नहीं उतरीं, बल्कि उन्होंने खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया, जो एक ‘बड़े तंत्र’ के खिलाफ खड़ा है। उनके भाषणों और अभियान में बार-बार यह भाव उभरा कि यह लड़ाई बाहरी बनाम स्थानीय की है, पहचान बनाम हस्तक्षेप की है। दूसरी ओर, भाजपा ने इस चुनाव को अपने राष्ट्रीय विस्तार की निर्णायक परीक्षा के रूप में लिया। २०२१ में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के बाद पार्टी ने इस बार संगठन, संसाधन और नैरेटिव, तीनों स्तरों पर पूरी ताकत झोंक दी। हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण, नागरिकता जैसे मुद्दों और ममता सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को केंद्र में रखकर एक ऐसा चुनावी माहौल तैयार किया गया, जिसमें मतदाता सिर्फ विकास या प्रशासन नहीं, बल्कि अपनी पहचान और असुरक्षाओं के आधार पर भी निर्णय ले रहा था।
लेकिन इस चुनाव की सबसे दिलचस्प और विवादित परत जो रही, वो थी केंद्रीय संस्थाओं की भूमिका। चुनाव आयोग की सख्ती, केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता और लगातार बढ़ती निगरानी ने एक नई बहस को जन्म दिया। क्या यह सब निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए था या फिर इससे राजनीतिक संतुलन प्रभावित हुआ? यह सवाल सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है; यह उस भरोसे से जुड़ा है, जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है। वोटिंग पैटर्न को देखें तो तस्वीर और जटिल हो जाती है। बंगाल हमेशा से ऐसे राज्य के रूप में जाना जाता रहा है, जहां वोट शेयर का अंतर बहुत कम होता है, लेकिन उसका असर बेहद बड़ा होता है। इस बार भी संकेत यही हैं कि मामूली प्रतिशत का उतार-चढ़ाव सत्ता की दिशा तय कर सकता है। मुस्लिम वोट बैंक, जो लंबे समय से ममता बनर्जी की ताकत रहा है, उसमें हल्की दरार की चर्चा है। वहीं हिंदू वोटों में असंतोष और ध्रुवीकरण दोनों साथ-साथ चलते दिखे। ग्रामीण और शहरी मतदाताओं के बीच भी सोच का फर्क साफ नजर आया।
नए मॉडल को वैधता का खतरा
अब सवाल नतीजों का नहीं, उनके मायनों का है। अगर ममता बनर्जी एक बार फिर जीत हासिल करती हैं तो यह सिर्फ उनकी व्यक्तिगत या पार्टी की जीत नहीं होगी। यह क्षेत्रीय दलों के लिए एक मजबूत संदेश होगा कि वे अब भी राष्ट्रीय राजनीतिक दबाव के बीच अपनी जमीन बचा सकते हैं। यह संघीय ढांचे की मजबूती का संकेत होगा और यह भी दिखाएगा कि स्थानीय नेतृत्व, अगर मजबूत हो तो किसी भी बड़ी चुनौती का सामना कर सकता है। लेकिन अगर भाजपा इस किले को भेदने में सफल होती है तो इसका असर बंगाल से कहीं आगे तक जाएगा।
यह जीत यह स्थापित कर सकती है कि भारत की राजनीति में अब कोई भी क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। यह चुनावी रणनीति, संसाधनों के इस्तेमाल और संस्थागत प्रभाव के एक नए मॉडल को वैधता दे सकता है। और सबसे अहम, यह २०२९ के आम चुनाव के लिए राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।
दरअसल, बंगाल का यह चुनाव एक तरह से २०२९ की प्रस्तावना है। यहां जो कुछ हो रहा है चाहे वह नैरेटिव हो, गठबंधन की राजनीति हो या संस्थाओं की भूमिका! वही आनेवाले समय में राष्ट्रीय स्तर पर और तीव्र रूप में दिखाई देगा। बहरहाल, यह चुनाव सिर्फ इस बात का पैâसला नहीं करेगा कि कोलकाता की सत्ता पर कौन बैठेगा। यह उस भरोसे की भी परीक्षा है, जो आम नागरिक लोकतंत्र में रखता है। क्या चुनाव अब भी समान अवसर का मंच हैं या वे धीरे-धीरे शक्ति संतुलन के नए खेल में बदल रहे हैं? बंगाल ने अपना पैâसला ईवीएम में दर्ज कर दिया है। अब देश इंतजार कर रहा है उस जनादेश का, जो यह बताएगा कि भारत की राजनीति आगे किस रास्ते पर चलेगी ? प्रतिस्पर्धा और संतुलन के रास्ते पर या नियंत्रण और केंद्रीकरण की ओर।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
