के.पी. मलिक
लद्दाख राज्य और युवाओं के रोजगार की लड़ाई का चेहरा बने सोनम वांगचुक को मोदी सरकार द्वारा जेल भेजना क्या सही निर्णय साबित होगा? क्योंकि यह ऐतिहासिक और कड़वा सत्य है कि महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सामने अंग्रेज भी नहीं टिक पाए थे! क्योंकि मेरा मानना है कि आंदोलन लाठी और जेल से नियंत्रित नहीं होते, बल्कि बेखौफ होकर भड़कते हैं।
भारत का लोकतंत्र एक निरंतर विकसित होती हुई प्रक्रिया है। यह किसी किताब में दर्ज किए गए शब्दों का केवल औपचारिक संग्रह नहीं है, बल्कि यह जीवंत अनुभवों और संघर्षों से निर्मित वह धरोहर है, जिसे हर पीढ़ी को संभालना और मजबूत करना पड़ता है। जब भी सत्ता और जनता के बीच दूरी बढ़ती है, जब भी सवाल पूछनेवाले नागरिकों को चुप कराने का प्रयास होता है, तब लोकतंत्र की जड़ें हिलने लगती हैं। इसी संदर्भ में आज सोनम वांगचुक का नाम देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में गूंज रहा है। वांगचुक केवल लद्दाख के एक पर्यावरणविद, शिक्षा सुधारक या समाजसेवी नहीं हैं, बल्कि वे अब उस व्यापक असंतोष का प्रतीक बन चुके हैं जो युवाओं के भीतर रोजगार, पहचान और न्याय की तलाश से उपज रहा है।
लद्दाख, जो कभी जम्मू-कश्मीर का हिस्सा हुआ करता था और अनुच्छेद-३७० हटने के बाद केंद्र शासित प्रदेश बना, वहां के लोगों ने सोचा था कि उनकी आकांक्षाओं को नई पहचान मिलेगी, प्रशासन पारदर्शी होगा और युवाओं के लिए रोजगार व अवसर पैदा होंगे, लेकिन आज वही लोग महसूस कर रहे हैं कि न तो उन्हें संवैधानिक गारंटी मिली और न ही वादों के अनुरूप विकास। स्थानीय जनजातीय समुदाय, पारिस्थितिकी की सुरक्षा के सवाल और पर्यटन से जुड़े आर्थिक अवसरों के बीच संतुलन बनाने का वादा केवल भाषणों में सिमट गया है। सोनम वांगचुक ने जब इन मुद्दों को आवाज दी तो वे लाखों युवाओं और नागरिकों के दिल की धड़कन बन गए।
सरकार ने जब उनकी आवाज को दबाने का रास्ता चुना और उन्हें जेल भेज दिया तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह निर्णय लोकतंत्र को मजबूत करेगा या उसे और कमजोर बनाएगा। इतिहास गवाह है कि सत्ता हमेशा आंदोलनकारियों को जेल भेजकर यह मान लेती है कि आवाज थम जाएगी, लेकिन हुआ इसके उलट। महात्मा गांधी को भी अंग्रेजों ने कितनी बार जेल में डाला, लेकिन हर बार उनकी गिरफ्तारी आंदोलन को और प्रचंड बना देती थी। गांधी का सत्याग्रह इसी विश्वास पर टिका था कि आंदोलन का बल हिंसा या हथियार में नहीं, बल्कि जनता के मनोबल और नैतिक साहस में होता है। इसी कारण अंग्रेजी साम्राज्य जैसे शक्तिशाली शासन को भी भारत छोड़ना पड़ा।
आजादी के इतने वर्षों बाद यह सोचने पर विवश होना पड़ रहा है कि क्या भारत में भी वही औपनिवेशिक तरीका अपनाया जा रहा है, जहां असहमति को दबाने के लिए लाठी और जेल का सहारा लिया जाता है। लोकतंत्र का असली सौंदर्य यह है कि वह असहमति को स्थान देता है, उसे सुनता है और उससे सुधार की राह निकालता है। यदि लोकतंत्र में असहमति को अपराध मान लिया जाए तो फिर लोकतंत्र और अधिनायकवाद में क्या अंतर रह जाएगा? वांगचुक का आंदोलन केवल लद्दाख राज्य की मांग तक सीमित नहीं है। यह युवाओं के उस दर्द की गूंज है जो पूरे देश में महसूस की जा रही है। बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है, सरकारी नौकरियों की संख्या कम हो रही है, निजी क्षेत्र भी अस्थिरता से जूझ रहा है। शिक्षा और कौशल विकास की बातें बहुत होती हैं, लेकिन जमीन पर लाखों डिग्रीधारी युवा भटकते नजर आते हैं। ऐसे में जब कोई नेता, कार्यकर्ता या समाजसेवी इन मुद्दों पर खुलकर बोलता है तो उसे दबाने के बजाय उसकी आवाज को लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा बनाना चाहिए। सरकार यह तर्क दे सकती है कि आंदोलनों से कानून-व्यवस्था बिगड़ती है, देश की छवि पर असर पड़ता है और विकास के काम प्रभावित होते हैं, लेकिन यह तर्क उतना ही खोखला है, जितना अंग्रेजों का यह कहना था कि गांधीजी का आंदोलन साम्राज्य की स्थिरता को तोड़ रहा है। हक और न्याय के लिए उठी आवाज कभी भी व्यवस्था-विरोधी नहीं होती, बल्कि वह व्यवस्था को बेहतर बनाने का माध्यम होती है। यदि सत्ता इस बुनियादी सत्य को नहीं समझती तो उसका भविष्य भी उतना ही असुरक्षित है जितना औपनिवेशिक शासन का हुआ करता था। आज सोनम वांगचुक के समर्थकों की संख्या केवल लद्दाख तक सीमित नहीं है। देशभर के विश्वविद्यालयों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और सड़कों पर युवा उनकी आवाज से जुड़ रहे हैं। यह स्थिति सरकार के लिए चेतावनी है कि असहमति को दबाने से असंतोष और गहरा ही होगा। लोकतंत्र को बचाने की मांग अब केवल वांगचुक का एजेंडा नहीं है, बल्कि वह हर नागरिक का एजेंडा बनता जा रहा है। इतिहास इस तथ्य को भी स्पष्ट करता है कि सत्ता जितनी कठोर होती है, आंदोलन उतना ही दृढ़ हो जाता है। गांधी, नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग जूनियर–सभी ने जेल की यातनाएं सहीं, लेकिन उनकी विचारधारा को कोई वैâद नहीं कर सका। यही कारण है कि वांगचुक को जेल भेजने से उनकी लोकप्रियता कम नहीं होगी, बल्कि बढ़ेगी। लोग उन्हें एक ‘नए गांधी’ या ‘संघर्ष के झंडाबरदार’ के रूप में देखना शुरू कर देंगे। यह छवि सरकार को राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकती है।
लोकतंत्र का असली संकट यह नहीं है कि सत्ता कौन चला रहा है, बल्कि यह है कि सत्ता जनता की आवाज को सुन रही है या नहीं। जब लोकतंत्र के भीतर सवाल पूछने की जगह खत्म हो जाएगी तो लोकतंत्र केवल औपचारिकता रह जाएगा। आज भारत जिस मुकाम पर है, उसे केवल आर्थिक विकास से परिभाषित नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र की मजबूती, न्याय की गारंटी और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा ही असली कसौटी है।
वांगचुक के संघर्ष ने इस प्रश्न को केंद्र में ला दिया है कि क्या भारत का लोकतंत्र अब भी वही है, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने बलिदान दिया था? क्या यह वही लोकतंत्र है जो गांधी, नेहरू, पटेल, आंबेडकर और भगत सिंह के सपनों में था? यदि सरकार असहमति को जेलों में डालकर खुद को सुरक्षित समझ रही है तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। लोकतंत्र को बंदीगृह की राजनीति से नहीं, बल्कि संवाद और पारदर्शिता से ही बचाया जा सकता है।
महात्मा गांधी ने कहा था कि जब भी कोई अन्याय हो तो उसका प्रतिकार करना ही नागरिक का धर्म है। वांगचुक इसी धर्म का पालन कर रहे हैं। उन्हें जेल भेजना केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि यह उन लाखों नागरिकों की आवाज को दबाने का प्रयास है, जो बेहतर भविष्य की मांग कर रहे हैं। इतिहास यह साबित करेगा कि ऐसी नीतियां टिकाऊ नहीं होतीं।
आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भारत अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए तैयार है? या फिर सत्ता की कठोरता लोकतंत्र को खोखला बना देगी? गांधीजी का सत्याग्रह हमें यही सिखाता है कि आंदोलन कभी हारता नहीं, केवल सत्ता की परीक्षा लेता है। सोनम वांगचुक का संघर्ष भी उसी परंपरा का हिस्सा है। यह संघर्ष चाहे जेल की सलाखों के पीछे चले या खुले मैदानों में, यह देश को यह याद दिलाएगा कि लोकतंत्र केवल वोट डालने का अधिकार नहीं है, बल्कि यह नागरिकों की सामूहिक आवाज का सम्मान करने की संस्कृति है।
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे यह तय करना है कि वह अपने लोकतंत्र को बचाएगा या सत्ता के केंद्रीकरण को ही राष्ट्रवाद मान लेगा। वांगचुक जैसे लोग केवल आंदोलनकारी नहीं हैं, वे हमें हमारी ही लोकतांत्रिक विरासत की याद दिलाते हैं और यदि लोकतंत्र को बचाने की यह मांग सशक्त होती चली गई तो इतिहास एक बार फिर गवाही देगा कि आंदोलन न लाठी से डरते हैं, न जेल से। वे बेखौफ होते हैं, क्योंकि उनके पीछे जनता का नैतिक बल खड़ा होता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
