-के.पी. मलिक
सियासत में नेता केवल भाषणों से नहीं बनते, उनकी एक राजनीतिक छवि भी बनाई जाती है, भाषणों की भाषा, मंचों की सजावट, सोशल मीडिया की रणनीति, तस्वीरों का चयन, मीडिया प्रबंधन और लगातार दोहराए जाने वाले संदेशों से। नरेंद्र मोदी की राजनीति भी इस अर्थ में आधुनिक राजनीतिक संचार का एक महत्वपूर्ण उदाहरण रही है। वर्षों में उनके इर्द-गिर्द निर्णायक नेतृत्व, मजबूत व्यक्तित्व और विकास की एक सुसंगत सार्वजनिक छवि निर्मित हुई है। लेकिन अब असली सवाल यह है कि जब राजनीतिक ब्रांड की चमक के पीछे रोजमर्रा के अनुभव, रोजगार, महंगाई, शिक्षा, संस्थाओं और आर्थिक दबाव के सवाल खड़े होने लगें, तो क्या केवल संचार उस दूरी को ढक सकता है?
यह कहना जल्दबाजी होगी कि मोदी की राजनीतिक छवि समाप्त हो रही है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि छवि और अनुभव के बीच के अंतर पर बहस पहले से अधिक दिखाई देने लगी है। हाल के युवा आंदोलनों और सरकार की नीतियों पर उठे सवालों ने इस बहस को नया आयाम दिया है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने भी २०२६ के युवा विरोध प्रदर्शनों को मोदी सरकार की राजनीतिक छवि के संदर्भ में रिपोर्ट किया है।
सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि राजनीति में प्रचार का काम केवल उपलब्धियों को बताना नहीं होता; वह जनता के सामने किस कहानी को सबसे प्रमुख बनाना है, यह भी तय करता है। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कहानी कितनी भी प्रभावी हो, अंतत: उसे जनता के अनुभव की कसौटी पर उतरना पड़ता है। बेरोजगार युवा को नौकरी चाहिए, किसान को कीमत चाहिए, मध्यमवर्ग को राहत चाहिए और उपभोक्ता को महंगाई से निजात। इनके सामने कोई भी राजनीतिक ब्रांडिंग तभी टिकती है, जब वास्तविक जीवन में उसके परिणाम दिखाई दें।
पंजाब में चुनाव से पहले संगठन की असली परीक्षा
यही बात पंजाब की राजनीति पर भी लागू होती है। २०२७ के विधानसभा चुनावों से पहले आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों के सामने अपनी-अपनी राजनीतिक कहानी जनता तक पहुंचाने की चुनौती है। पंजाब का मुकाबला केवल सरकार बनाम विपक्ष का साधारण मुकाबला नहीं रहेगा; संगठन, नेतृत्व, स्थानीय समीकरण और विपक्षी वोटों के बंटवारे की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। मौजूदा रिपोर्टों में कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और गुटबाजी को प्रमुख चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया है। अमरिंदर सिंह, राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच नेतृत्व-संबंधी तनाव की चर्चा लगातार होती रही है। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी के सामने सत्ता में रहते हुए अपने शासन का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखने की चुनौती है। हाल की राजनीतिक गतिविधियों से यह भी स्पष्ट है कि भाजपा और अकाली दल विपक्षी स्पेस में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए पंजाब में अगला चुनाव केवल यह सवाल नहीं पूछेगा कि कौन किसके खिलाफ है? असली सवाल यह होगा कि कौन जनता के सामने ऐसा राजनीतिक नैरेटिव रख पाता है, जिसे संगठन और जमीनी मुद्दों का समर्थन भी मिले।
१०० फीसदी टैरिफ का डर और अर्थव्यवस्था की वास्तविक परीक्षा
इस पूरे विमर्श का सबसे गंभीर हिस्सा भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों से जुड़ा है। अमेरिका में हालिया कानून ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर १०० फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति को दिया है। भारत, रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में है इसलिए यह प्रावधान भारतीय निर्यात और द्विपक्षीय व्यापार के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करता है। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि ऊर्जा सुरक्षा उसके लिए महत्वपूर्ण है और अमेरिका के साथ बातचीत जारी है। यहां एक तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है कि १०० फीसदी टैरिफ का अधिकार मिलना और भारत के हर माल पर तत्काल १०० फीसदी शुल्क लग जाना एक ही बात नहीं है। वास्तविक प्रभाव अमेरिकी प्रशासन के अगले पैâसलों, संभावित छूटों, लागू होने वाली शर्तों और भारत-अमेरिका वार्ता पर निर्भर करेगा।
लेकिन खतरा केवल आंकड़े का नहीं है। यदि भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी बाजार में भारी शुल्क लगता है तो निर्यातकों की लागत बढ़ सकती है, प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है और अंतत: इसका असर रोजगार तथा कुछ उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों तक पहुंच सकता है। खासकर अमेरिका पर निर्भर निर्यात क्षेत्रों के लिए यह चिंता अधिक महत्वपूर्ण है। इससे पहले जुलाई २०२६ में भारत पर अमेरिकी अनुच्छेद ३०१ के तहत अतिरिक्त १० फीसदी शुल्क भी घोषित हुआ था, हालांकि कई उत्पाद इसके दायरे से बाहर रखे गए। यानी आज भारत के सामने दोहरी चुनौती है कि एक तरफ घरेलू राजनीति में नैरेटिव को वास्तविकता से जोड़ना और दूसरी तरफ वैश्विक व्यापार राजनीति में राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना।
दरअसल, सियासत में ब्रांड बनाना कठिन है, लेकिन उससे भी कठिन है उस ब्रांड को लगातार वास्तविकता के साथ मिलाकर रखना। नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा इसका बड़ा उदाहरण है। जिस नेतृत्व की छवि वर्षों तक निर्णायकता और नियंत्रण की कहानी सुनाती रही, उसके सामने अब जनता के अनुभव, युवा असंतोष, आर्थिक दबाव और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की नई चुनौतियां अधिक मुखर होकर खड़ी हैं। पंजाब का चुनाव भी इसी बदलते दौर की प्रयोगशाला बन सकता है और भारत-अमेरिका टैरिफ विवाद भी। दोनों जगह एक ही सवाल अलग-अलग रूप में सामने है कि क्या राजनीति केवल नैरेटिव से चलती है, या अंतत: नैरेटिव को जनता के अनुभव के सामने जवाब देना ही पड़ता है? क्योंकि लोकतंत्र में विज्ञापन कहानी सुना सकता है, प्रचार छवि बना सकता है और राजनीतिक संचार संदेश को दूर तक पहुंचा सकता है लेकिन अंतिम संपादक जनता ही होती है।
(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनीतिक संपादक हैं)
