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सफाई के नाम पर सियासी झोल…महायुति के ‘ठेके’ की खुली पोल!.. काम ६०० लेबरों से और भुगतान १२०० मजदूरों का

सुनील ओसवाल / मुंबई-नासिक

शहर में ठेकेदारी पद्धति से काम कर रहे सफाई कर्मचारियों को लेकर एक गंभीर और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामला सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, नासिक में करीब १२०० सफाई मजदूर ठेके पर दर्ज हैं। कागजों में हर मजदूर को प्रति माह लगभग २२,५०० रुपए मेहनताना दिखाया जाता है, लेकिन आरोप है कि इस रकम में से सीधे करीब ८,००० रुपए ठेकेदार काट लेता है। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाला दावा यह है कि जिन बैंकों में इन सफाई कर्मचारियों का वेतन जमा होता है, उन खातों के एटीएम कार्ड कई मामलों में खुद मजदूरों के पास नहीं, बल्कि संबंधित ठेकेदारों के कब्जे में हैं। यानी पैसा मजदूर के नाम पर आता है, लेकिन उस पर नियंत्रण ठेकेदार का।
सूत्र बताते हैं कि १२०० कर्मचारियों में से रोज केवल ६०० को ही काम पर बुलाया जाता है। एक दिन एक सेट, तो दूसरे दिन दूसरा। जमीन पर हर दिन आधी संख्या ही दिखाई देती है, लेकिन भुगतान पूरे १२०० कर्मचारियों का किया जाता है। सवाल सीधा और गंभीर है- जब रोज काम सिर्फ ६०० लोग करते हैं, तो बाकी ६०० के वेतन की रकम आखिर जा कहां रही है? मनपा के रिकॉर्ड में पूरे कर्मचारी मौजूद, लेकिन सड़कों पर आधा अमला-यह अंतर किसके लिए मुनाफा बन रहा है?
मामला बना विस्फोटक
मनपा चुनाव की पृष्ठभूमि में इस ठेके को लेकर सियासी दखल की चर्चा ने मामले को और विस्फोटक बना दिया है। सूत्रों का दावा है कि इस पूरी व्यवस्था में अब शिंदे गुट की एंट्री हो चुकी है और ‘बिदागी’ की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। चर्चा यह भी है कि इस कथित अतिरिक्त रकम का इस्तेमाल मनपा चुनाव प्रचार के खर्च के लिए किए जाने की तैयारी है। हालांकि, इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।
ठेके की बढ़ाई गई समयसीमा
इसी बीच, चुनावी सरगर्मी के दौरान संबंधित ठेके को छह महीने के लिए बढ़ाए जाने की खबर सामने आई है। सवाल यह नहीं कि ठेका बढ़ाया गया, सवाल यह है कि चुनाव के ठीक पहले यह पैâसला किस जल्दी और किन हालात में लिया गया।
मनपा, सत्ता और ठेकेदारी की मिलीभगत
नासिक में सफाई मजदूरों के नाम पर चल रही यह व्यवस्था अब केवल श्रमिक शोषण या वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं रही। शिंदे गुट से जुड़ी चर्चाओं के बाद यह ठेका सीधे-सीधे राजनीतिक फंडिंग, नगर प्रशासन की भूमिका और चुनावी खर्च के स्रोतों पर सवाल खड़े कर रहा है। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ मनपा का नहीं, बल्कि सत्ता, ठेकेदारी और चुनावी राजनीति के खतरनाक गठजोड़ की एक गंभीर मिसाल बन सकता है।

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