विमर्शकर्ता:
पं. प्रेमानंद शास्त्री (मणिकर्णिका घाट वाले)
हर-हर महादेव! मणिकर्णिका घाट की पावन चिताओं और गंगा की कलकल धाराओं के बीच पुन: पधार चुके हैं आपके अपने पंडित प्रेमानंद शास्त्री। जब इश्क के रोग में अक्ल पर ताला लग जाए और दिल का स्टॉक मार्केट क्रैश हो जाए, तो समझो हमारी ओपीडी में हाजिरी लगाने का वक्त आ गया है। आइए, देखते हैं आज के अंक में कौन से दो नए आशिक अपना पर्चा लेकर कतार में खड़े हैं!
‘पंडित जी, सोशल मीडिया पर हमारी नई-नई प्रेमिका किसी और की रीलों पर `हार्ट’ इमोजी और इमोटिकॉन भेजती है, सीने पर सांप लोट रहे हैं, क्या करें?’ -विवेक, बोरिवली
-वत्स विवेक! तुम तो उस नासमझ दीवाने की भांति हो जो डिजिटल दुनिया की मायावी रोशनी को ही सूर्य समझ बैठा है। प्राचीन आचार्यों ने सत्य ही कहा है, `अति सर्वत्र वर्जयेत!’ यानी किसी भी बात की अति या हर छोटी बात पर शक करना विनाश का मार्ग है। डिजिटल प्रेम भी किसी रेतीले महल जैसा है, जितना कसकर पकड़ोगे, उतनी जल्दी हाथ से फिसलेगा। ऑनलाइन क्या लाइक कर रही है, इसका हिसाब रखना बंद करो। यदि तुम्हारा प्रेम सच्चा है, तो वो रीलों के मोहजाल से निकलकर तुम्हारी बाहों में ही आएगी। शक की बीमारी का कोई एंटीबायोटिक नहीं होता, कोई एंटीडॉट नहीं होता इसलिए थोड़ा जिगर बड़ा करो और अपनी ऊर्जा रीलों देखने के बजाय अपने करियर पर लगाओ!
महाराज, पहली मुलाकात में ही हमारा दिल सहपाठी पर आ गया है, पर हम शर्मीले स्वभाव के हैं। प्रेम निवेदन कैसे करें?’ – मनोज, कल्याण
-हे संकोची मनोज! मणिकर्णिका की भस्म गवाह है कि डरपोक और शर्मीले इंसानों के इतिहास में कभी कोई महाकाव्य नहीं लिखा गया। महाकवि का कथन है, `साहसी श्रीः प्रतिवसति’ अर्थात लक्ष्मी और सफलता हमेशा साहसी मनुष्यों का ही वरण करती है, कोने में दुबक कर बैठने वालों का नहीं। लोक-उक्ति प्रसिद्ध है, `जो डर गया, समझो मर गया!’ अब बिना मरे, प्रेम की जंग तो जीतनी ही पड़ेगी। घुटनों पर बैठने की जरूरत नहीं है, बस कैंटीन में जाकर एक कप चाय का ऑफर दो और नजरें मिलाकर अपने दिल की बात कह डालो। यदि स्वीकार हुआ तो बल्ले-बल्ले, अन्यथा सब चंगा सी कहते हुए चाय का बिल भर देना!
