मुख्यपृष्ठस्तंभपूर्वांचल पॉलिटिक्स : भावुक प्रहार, नागरिकता से राष्ट्र तक इकरा की पुकार

पूर्वांचल पॉलिटिक्स : भावुक प्रहार, नागरिकता से राष्ट्र तक इकरा की पुकार

हिमांशु राज
लोकसभा की हालिया बहस में जब भारतीय संसद में सबसे कम उम्र की मुस्लिम महिला वैâराना की सांसद इकरा हसन ने वंदे मातरम् पर बोलना शुरू किया तो यह महज एक जवाबी बयान नहीं था, यह एक राजनीतिक और सामाजिक प्रतिध्वनि थी, जिसने राष्ट्रवाद की परंपरागत परिभाषा को नए सिरे से परखा। उन्होंने वंदे मातरम् को किसी एक मजहबी दायरे में सीमित करने के बजाय इसे धरती और पर्यावरण की सामूहिक स्तुति के रूप में देखा। उनके शब्दों में यह भाव साफ था कि ‘सुजलाम‑सुफलाम, शस्य‑श्यामलाम’ तब ही सार्थक हैं जब हमारी नदियां, खेत और हवा जिंदा रहें। यह बयान स्वाभाविक रूप से किसान, पर्यावरण और संवैधानिक जिम्मेदारी के बीच के रिश्ते पर सीधा संकेत था। सदन में कुछ पलों की खामोशी और सर हिलाते सांसदों ने दिखा दिया कि यह मुद्दा केवल भावनात्मक नहीं, नीति और प्राथमिकता पर सवाल है — क्या राष्ट्रभक्ति केवल नारा बनकर रह जाएगी या जमीन और जीवन की रक्षा भी उसका हिस्सा बनेगी? यही संतुलन इकरा हसन के भाषण को एक राजनीतिक कथन बना देता है, जो सत्ता और विपक्ष दोनों से जवाब मांगता है। उनका भाषण तब और धारदार हो गया, जब उन्होंने भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति पर बार‑बार उठाए जाने वाले सवालों को सीधे संबोधित किया। ‘हम इंडियन बाय चॉइस हैं, बाय चांस नहीं’ — इस वाक्य में उन्होंने नागरिकता की बहस को वैचारिक गहराई दी। यह टिप्पणी केवल भावनात्मक नहीं थी; यह उस राजनीतिक विमर्श पर प्रहार था जो पहचान को निष्ठा की कसौटी बनाने पर तुला है। भाषण के आखिरी हिस्से में उनकी आवाज का कंपन और शब्दों का ताप इस बात का गवाह था कि उनके अनुभव व्यक्तिगत भी हैं और राजनीतिक भी। पहले जिस युवती को सड़क पर अपमान झेलना पड़ा था, वही अब सदन में खड़ी होकर संविधान, वंदे मातरम् और तिरंगे के बीच सामंजस्य का तर्क दे रही थी। उनका संदेश सीधा था — असली टकराव प्रतीकों के बीच नहीं, बल्कि उन नजरियों के बीच है जो इन प्रतीकों को बहिष्कार के हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। इकरा हसन का यह वक्तव्य आज के दौर में एक राजनीतिक माइलस्टोन जैसा प्रतीत होता है — जहां एक महिला सांसद अपने निजी दर्द को वैचारिक अभिव्यक्ति में ढालकर बताती है कि देशभक्ति की असली परीक्षा जमीन, इंसान और समानता की रक्षा में है।

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