मुख्यपृष्ठस्तंभराज की बात : मांसाहारी गाय के दूध का मसला

राज की बात : मांसाहारी गाय के दूध का मसला

द्विजेंद्र तिवारी, मुंबई

विदेश यात्रा पर गए भारतीय वापसी में अक्सर ड्यूटी फ्री दुकानों से झोला भर-भरकर स्विस चॉकलेट खरीदते पाए जाते हैं। विदेश में दूध वाली स्टारबक्स कॉफी, चेडर चीज और बटर का खूब सेवन करते हैं। लेकिन शुद्ध शाकाहारी लोगों को शायद यह नहीं पता होगा कि इन डेयरी उत्पादों को तैयार करने में इस्तेमाल दूध किसी मांसाहारी गाय का हो सकता है। यही वजह है कि दुनिया में अब शाकाहारी से भी बढ़कर ‘वीगन’ का प्रचलन बढ़ रहा है, जिसमें मांसाहार के साथ ही डेयरी उत्पादों से परहेज किया जाता है। भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा टकराव का एक प्रमुख मुद्दा मांसाहारी गाय का दूध है।
अमेरिका का दबाव
पिछले बीस वर्षों में यह चौथी बार है जब मांसाहारी गायों का दूध भारत में खपाने के लिए अमेरिकी सरकार ने दबाव डाला है। वर्ष २००३ के बाद अगले चार वर्षों तक मनमोहन सिंह सरकार पर लगातार अमेरिका दबाव डालता रहा। वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (डब्लूटीओ) में डेयरी आयात पर भारत के प्रतिबंधों को अमेरिका ने चुनौती दी। तब भी भारत का कहना था कि धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता की वजह से यह संभव नहीं कि मांसाहारी गायों से प्राप्त दूध को भारत में मंजूरी दी जाए।
राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में भी यह कोशिश हुई। अमेरिकी नेशनल मिल्क प्रोड्यूसर्स फेडरेशन (एनएमपीएफ) और यूएस डेयरी एक्सपोर्ट काउंसिल सहित अमेरिकी डेयरी उद्योग लॉबी ने भारत के विशाल बाजार तक पहुंच बनाने के लिए कड़ा दबाव डाला। अमेरिका ने भारत की ‘शाकाहारी गायों’ के प्रमाणन की अनिवार्यता में ढील देने की मांग की, जिसे भारत ने अस्वीकार कर दिया।
वर्ष २०१९ की मिनी ट्रेड डील में भी तत्कालीन ट्रंप प्रशासन भारत के साथ एक सीमित व्यापार समझौते को अंतिम रूप देना चाहता था, जिसमें डेयरी उत्पादों को भारत में बेचने की अनुमति शामिल थी। अमेरिकी सरकार की यह कोशिश असफल रही।
चारे में खून हड्डी
आखिर अमेरिका के दबाव और भारत के इनकार की वजह क्या है? दरअसल, अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में दुधारू मवेशियों को दूध की पैदावार बढ़ाने के लिए आमतौर पर मांसाहारी खाद्य पदार्थ खिलाए जाते हैं। अमेरिका में तो पशु आहार पूरी तरह मांसाहार होता है। अमेरिकी अखबार ‘द सिएटल टाइम्स’ की एक खबर के मुताबिक ‘गायों को ऐसा चारा खिलाया जाता है जिसमें सूअर, मछली, मुर्गी, घोड़े, यहां तक कि बिल्ली या कुत्ते के अंग भी शामिल हो सकते हैं। प्रोटीन के लिए सूअर और घोड़े का खून इस्तेमाल होता है। चर्बी मिश्रित चारा अक्सर मृत जानवरों के अंगों, मुर्गीखानों के मल अपशिष्ट से बना होता है।’
अमेरिकी मीडिया की खबरों में कहा गया है कि मछली से प्राप्त प्रोटीन युक्त आहार का उपयोग गायों में प्रोटीन बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसी तरह जानवरों के खून को सुखाकर उसका पाउडर बनाया जाता है और गायों के चारे में मिलाया जाता है। इसमें प्रोटीन और आयरन की मात्रा अधिक होती है। इसी तरह बूचड़खानों के बचे मांस और हड्डी से चूरा बनाकर गायों के चारे में मिलाया जाता है। इसमें अमीनो एसिड और वैâल्शियम मिलता है, जिससे गायों के बेहतर स्वास्थ्य और ज्यादा दूध मिलने में सहायता मिलती है। यानी किसी भी जानवर जैसे सुअर, मुर्गी, गाय बैल के मृत अवशेषों को सुखाकर उसका पाउडर बनाकर चारे में इस्तेमाल करना सामान्य प्रक्रिया है।
आर्थिक कारक
भारत की धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं के अलावा, आर्थिक कारक भी महत्वपूर्ण हैं। भारत का डेयरी क्षेत्र दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्र है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग तीन प्रतिशत का योगदान देता है और आठ करोड़ से ज्यादा लोगों की आजीविका का साधन है। अमेरिकी डेयरी आयात के लिए बाजार खोलने से सस्ते उत्पादों की बाढ़ आ सकती है, जिससे घरेलू कीमतें गिर सकती हैं और किसानों की आर्थिक स्थिरता को खतरा हो सकता है। भारतीय स्टेट बैंक के एक विश्लेषण में अनुमान लगाया गया है कि अगर भारत अपने डेयरी क्षेत्र को अमेरिकी आयात के लिए खोलता है तो उसे सालाना लगभग एक लाख करोड़ रुपए का नुकसान होगा।
परमाणु परीक्षण से लेकर वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन के आर्थिक दबावों का सामना पूर्ववर्ती सरकारों ने बहुत कुशलता पूर्वक किया था। देश के किसानों की नजर इस बात पर रहेगी कि नरेंद्र मोदी सरकार अमेरिका के इस दबाव पर किस तरह से टिकी रहती है।
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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