भावना सिंह
रविवार का दिन, जिसे आम कामकाजी मुंबईकर अपने परिवार के साथ चैन के दो पल बिताने और अपनों से मिलने के लिए संजोकर रखता है, लेकिन रेल प्रशासन कुनीतियों के कारण अब एक ‘बला’ बन चुका है। ‘मेगा ब्लॉक’ के नाम पर पटरियों की मरम्मत का जो खेल सालों से चल रहा है, उसने आम नागरिक की सामाजिक और पारिवारिक जिंदगी को तहस-नहस कर दिया है। रविवार को जब रेल प्रशासन के आला अधिकारी अपने घरों में छुट्टियां मना रहे होते हैं, तब स्टेशन के प्लेटफार्मों पर यात्रियों का हुजूम चींटियों की तरह रेंगने को मजबूर होता है। इस भीड़ में सबसे ज्यादा बदहाली उन बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों की होती है, जो रोजमर्रा की आपाधापी से दूर रविवार को बाहर निकलने की हिम्मत जुटाते हैं।
ब्लॉक के कारण ट्रेनों की प्रâीक्वेंसी कम होती है, जिससे डिब्बे इंसानों से नहीं, बल्कि बेबसी से ठसाठस भरे होते हैं। ट्रेन में चढ़ने-उतरने की इस जानलेवा जद्दोजहद में अक्सर परिवार बिखर जाते हैं, बाप ट्रेन में रह जाता है तो बच्चा प्लेटफार्म पर। ऐसे हृदयविदारक दृश्यों के बीच रेल प्रशासन की संवेदनहीनता तब पराकाष्ठा पार कर जाती है, जब यात्रियों की इस मजबूरी को समझने के बजाय ईमानदार, कर्तव्य परायण और तन, मन वचन से सरकार के प्रति समर्पित टीसी ‘टिकट चेकर’ गिद्धों की तरह उन पर टूट पड़ते हैं। विडंबना देखिए, रविवार को ही ये टीसी सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं। वे जानते हैं कि रोज की भीड़ से अनजान ये चेहरे आसानी से उनके शिकार बन जाएंगे। प्लेटफार्म पर छूटे हुए डरे-सहमे परिजनों को सांत्वना देने के बजाय उन्हें जलील किया जाता है, महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा जाता। क्या प्रशासन को इस बात की जानकारी नहीं है कि ये लोग अपराधी नहीं, बल्कि आपकी कुव्यवस्था के सताए हुए नागरिक हैं? रविवार के दिन भी यात्रियों को ट्रेन से लटक कर यात्रा के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसके लिए क्या रेलवे प्रशासन दोषी नहीं है? रविवार के दिन भी बार-बार ‘… हमें खेद है ‘ वाला संदेश प्रसारित करके अपनी जिम्मेदारी से छुट्टी पा लेते हैं!
मुंबई हाई कोर्ट भी साफ कर चुका है कि रेल से लटककर यात्रा करना किसी का शौक नहीं, बल्कि यात्रियों की ‘मजबूरी’ है। हर लटकते हुए यात्री को पता है कि घर पर कोई उसका इंतजार कर रहा है, लेकिन रेल प्रशासन को शायद किसी के इंतजार की परवाह नहीं। सवाल यह है कि रेलवे कब तक यात्रियों की इस लाचारी का फायदा उठाकर अपना तिजोरी भरता रहेगा? जिस दिन यह दबा हुआ आक्रोश उबलकर बाहर आएगा, उस दिन क्या आपका ‘खेद है’ वाला संदेश किसी काम आएगा?
