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साहित्य शलाका :  बदलते परिवार और प्रेमचंद… क्या आज फिर एक प्रेमचंद की आवश्यकता है?

प्रो. दयानंद तिवारी

भारतीय साहित्य का इतिहास केवल शब्दों का इतिहास नहीं है; वह समाज की आत्मा का इतिहास भी है। जब-जब समाज ने अपने भीतर परिवर्तन की आहट सुनी, साहित्य ने उसे शब्द दिए। और जब समाज अपने ही मूल्यों से डगमगाने लगा, तब साहित्य ने उसे आईना दिखाया। हिंदी साहित्य में यदि किसी एक लेखक ने परिवार, किसान, स्त्री, श्रम और मनुष्य की गरिमा को सबसे अधिक गहराई से समझा और समझाया, तो वे मुंशी प्रेमचंद थे। आज, जब भारतीय परिवार अभूतपूर्व संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, तब प्रेमचंद की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है।
प्रेमचंद का साहित्य किसी कल्पनालोक की रचना नहीं था। वह खेतों की मिट्टी से निकला था, चौपालों की धूल से बना था और भारतीय परिवारों की धड़कनों से संचालित था। उन्होंने महलों की चमक नहीं, झोपड़ियों का धुआं लिखा; संपन्नता का प्रदर्शन नहीं, संघर्ष की गरिमा लिखी। इसलिए उनके हर पात्र चाहे जैसे भी हों आज भी हमारे आसपास चलते-फिरते दिखाई देते हैं।
प्रेमचंद ने परिवार को केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं माना। उनके लिए परिवार वह नैतिक संस्था था, जहां मनुष्य त्याग, विश्वास, उत्तरदायित्व और सह-अस्तित्व का अभ्यास करता है। ‘गोदान’ का होरी इसीलिए अमर है कि वह अपने लिए नहीं, परिवार के लिए जीता है। ‘निर्मला’ इसलिए कालजयी है कि वह एक परिवार की त्रासदी के माध्यम से पूरे समाज की विकृत मानसिकता को उद्घाटित करती है। ‘बड़े घर की बेटी’ यह स्थापित करती है कि परिवार अधिकार से नहीं, उदारता से चलता है। वहीं ‘ईदगाह’ का हामिद यह सिद्ध करता है कि प्रेम का सबसे बड़ा रूप त्याग है, उपभोग नहीं।
वस्तुत: प्रेमचंद ने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बनाया। उन्होंने कभी भाषण नहीं दिए, किंतु उनकी कहानियां समाज से संवाद करती रहीं। उन्होंने कानून नहीं बनाए, लेकिन उनकी रचनाओं ने मनुष्य के भीतर न्यायबोध जगाया। उन्होंने आंदोलन नहीं चलाए, पर उनके साहित्य ने सामाजिक चेतना को आंदोलित अवश्य किया।
यही साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति है वह मनुष्य के भीतर परिवर्तन लाता है, और भीतर का परिवर्तन ही बाहर की व्यवस्था को बदलता है।
आज का भारतीय परिवार प्रेमचंद के समय से भिन्न है। तब अभाव था, आज उपभोग है। तब संसाधनों की कमी थी, आज संवेदनाओं की कमी का संकट है। तब संयुक्त परिवारों में आर्थिक संघर्ष थे, आज एकल परिवारों में भावनात्मक रिक्तता है। तब चूल्हे के चारों ओर संवाद होता था, आज एक ही छत के नीचे बैठे लोग अलग-अलग स्क्रीन पर अपने-अपने संसार में खोए रहते हैं। पहले परिवार समय के अभाव से नहीं, साधनों के अभाव से जूझता था; आज साधन हैं, पर साथ बैठने का समय नहीं।
यही वह मोड़ है, जहां प्रेमचंद की दृष्टि फिर से हमारा मार्गदर्शन करती है। यदि वे आज लिख रहे होते, तो संभवत: उनका किसान केवल वर्षा की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि जलवायु परिवर्तन, कर्ज, बाजार और तकनीकी असमानताओं से भी संघर्ष करता। उनकी ‘निर्मला’ केवल दहेज की शिकार नहीं होती, बल्कि मानसिक अवसाद, साइबर उत्पीड़न और सामाजिक अपेक्षाओं के दबाव से भी जूझती। उनका ‘हामिद’ अपनी दादी के लिए चिमटा नहीं, शायद डिजिटल दुनिया में उनका अकेलापन दूर करने का कोई माध्यम खोजता। समय बदल जाता, पात्र बदल जाते, किंतु प्रेमचंद की मानवीय दृष्टि नहीं बदलती।
यहीं आधुनिक साहित्य के सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है क्या हम अपने समय के परिवार को उसी ईमानदारी से लिख रहे हैं, जिस ईमानदारी से प्रेमचंद ने अपने समय को लिखा था? आज साहित्य का बड़ा हिस्सा बाजार, तात्कालिक लोकप्रियता और व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित होता दिखाई देता है। परिवार के भीतर बदलते संबंध, वृद्धों का अकेलापन, बच्चों का भावनात्मक विस्थापन, दांपत्य संवाद का क्षरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में मानवीय संवेदनाओं का क्षीण होना ये विषय अभी भी गंभीर साहित्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
प्रेमचंद का अनुकरण उनकी भाषा अपनाने में नहीं, उनकी दृष्टि अपनाने में है। उन्होंने अपने समय की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों को साहित्य का विषय बनाया। आज के लेखक का दायित्व भी यही है कि वह अपने समय की पारिवारिक विडंबनाओं को शब्द दे, केवल उनका वर्णन न करे, बल्कि उनके समाधान की सांस्कृतिक दिशा भी प्रस्तुत करे।
यह स्मरण रखना होगा कि समाज केवल न्यायालयों, संसदों और नीतियों से नहीं बदलता। समाज तब बदलता है, जब उसकी संवेदना बदलती है और संवेदना का सबसे बड़ा विद्यालय साहित्य है। प्रेमचंद ने भारतीय परिवार को पढ़ा भी, समझा भी और उसे दिशा भी दी। आज आवश्यकता किसी दूसरे प्रेमचंद की नहीं, बल्कि प्रेमचंद जैसी सामाजिक प्रतिबद्धता वाले साहित्य की है।
यदि भारतीय परिवार को अपनी आत्मा बचानी है, तो उसे फिर से साहित्य की ओर लौटना होगा। और यदि साहित्य को अपनी सार्थकता सिद्ध करनी है, तो उसे फिर से परिवार की ओर लौटना होगा। शायद यही वह बिंदु है, जहां बदलते समय में प्रेमचंद फिर हमारे समकालीन हो उठते हैं।
अस्तु
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)

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