-सत्संग, प्रेम और समर्पण की आत्मीय यात्रा
प्रो. दयानंद तिवारी
भक्ति मनुष्य के भीतर बसे विश्वास, प्रेम और आत्मीयता को अभिव्यक्ति देती है। जब यह अनुभूति कविता में उतरती है, तो शब्द केवल शब्द नहीं रहते बल्कि वे प्रार्थना, पुकार और मन के संवाद बन जाते हैं। कविवर दास नारायण के कृष्ण-भक्ति पदों में ऐसी ही आत्मीयता दिखाई देती है। उनके पदों में श्रीकृष्ण कभी भरोसे का आधार हैं, कभी प्रेम के केंद्र, तो कभी दुःख और असमंजस के समय मन को सहारा देने वाले आराध्य।
कवि की भक्ति-साधना को समझने के लिए उनके संस्कारों की ओर देखना आवश्यक है। दास नारायण अपनी मां को श्रीकृष्ण की भक्त बताते हैं और स्वीकार करते हैं कि मां स्वयं भी पदों की रचना करती थीं। उनके मन पर मां के भक्ति-संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ा। घर में सुने गए भजन, पूजा के समय मां की वाणी और आराध्य के प्रति श्रद्धा-ये सब उनके काव्य-मन की आधारभूमि बने। बचपन में मिली ऐसी स्मृतियां समय के साथ मिटती नहीं; वे व्यक्ति के विचार और संवेदना में अपना स्थान बना लेती हैं।
कवि ने वर्ष १९८४ में इस्कॉन से जुड़ने का उल्लेख किया है। सत्संग, सेवा और कृष्ण-स्मरण का वातावरण उनकी जीवन-दृष्टि का हिस्सा बना। वे अपनी रचना-प्रक्रिया को भी सहज अनुभूति से जोड़ते हैं। उनके अनुसार, अनेक पद स्वाभाविक रूप से लिखे गए और बाद में उन्हें संकलित करने का प्रयास हुआ। वे इसका श्रेय भगवान श्रीकृष्ण की कृपा को देते हैं। इस कथन में भक्त का विश्वास भी है और रचनाकार की विनम्रता भी-मानो कविता उनके भीतर आई हुई अनुभूति का प्रसाद हो।
दास नारायण के पदों में सत्संग एक महत्वपूर्ण विचार के रूप में उभरता है। ‘उपजत भक्ति श्याम सत्संगा’ पद में कवि सत्संग को भक्ति के अंकुरण का माध्यम बताते हैं। जिस प्रकार बीज को बढ़ने के लिए अनुकूल भूमि और वातावरण चाहिए, उसी प्रकार मन में श्रद्धा और भक्ति को विकसित होने के लिए अच्छी संगति की आवश्यकता होती है। सत्संग केवल धार्मिक सभा में बैठने का नाम नहीं; यह उन विचारों, लोगों और अनुभवों के निकट रहने का अवसर है जो मन को बेहतर दिशा दें। हम जिन लोगों के साथ समय बिताते हैं, जिन बातों को सुनते हैं और जिन आचरणों को देखते हैं, उनका प्रभाव धीरे-धीरे हमारे विचारों पर पड़ता है। सत्संग हमें अपने भीतर झांकने का अवसर भी देता है। हम अपनी अधीरता, अहंकार और व्यवहार की कठोरता को पहचान सकते हैं तथा करुणा, धैर्य और विनम्रता की ओर बढ़ सकते हैं। कवि सत्संग की तुलना गंगा की पवित्रता से करते हैं। यह परिचित उपमा उनके भाव को सहज और प्रभावी बनाती है।
उनके पदों में कृष्ण-प्रेम का स्वर भी अत्यंत निकट और निजी है। आराध्य यहां दूर स्थित किसी शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि भक्त के हृदय के बहुत पास उपस्थित हैं।
कवि कहीं कृष्ण को आंखों की ज्योति और हृदय की धड़कन कहता है, तो कहीं उनके दर्शन की विनती करता है। ‘नयनों की तुम ज्योति बने हो, हृदय की धड़कन गोपाला’ जैसी पंक्तियों में कृष्ण के प्रति प्रेम भक्त के अस्तित्व से जुड़ जाता है। आंखों की ज्योति संसार को देखने का माध्यम है और हृदय की धड़कन जीवन का संकेत। इन दोनों बिंबों के माध्यम से कवि अपने आराध्य को जीवन के आधार के रूप में अनुभव करता है।
कृष्ण के प्रति यह प्रेम केवल विरह या दर्शन की आकांक्षा तक सीमित नहीं रहता। इसमें भरोसा और शरणागति का भाव भी है। ‘करौं भरोसो कृष्ण चरण में’ कहकर कवि अपने आराध्य के चरणों में विश्वास व्यक्त करता है। जीवन में मनुष्य को अपने परिश्रम और जिम्मेदारियों का निर्वाह करना ही होता है, फिर भी किसी गहरे विश्वास का सहारा कठिन समय में धैर्य देता है। भक्त के लिए कृष्ण वही आंतरिक आधार हैं। यह भरोसा पलायन नहीं, बल्कि मन को स्थिर रखने वाली आस्था है।
कवि के पदों में रंग का बिंब विशेष रूप से प्रभावशाली है। कृष्ण के प्रेम में रंग जाने का भाव भक्त और आराध्य के बीच की दूरी को मिटाता है। ‘मोहन, अब और रंग मत डालो; तुम्हारा रंग तो मेरे भीतर समा गया है’। इस अनुभूति में प्रेम की गहराई है। यहां रंग बाहरी उत्सव का रंग नहीं, बल्कि मन पर चढ़ी ऐसी छाप है जो जीवन-दृष्टि को बदल देती है। प्रेम जब भीतर उतरता है, तब वह व्यवहार में कोमलता और संबंधों में अपनापन बनकर दिखाई दे सकता है
दास नारायण की भक्ति का एक सुंदर पक्ष उनकी प्रार्थना का नैतिक स्वर है। वे केवल सुख या कृपा नहीं मांगते, बल्कि सत्य, प्रेम और सद्गुणों की कामना करते हैं। ‘सत्य की लौ मन में होवे, प्रेम का संसार’ जैसी पंक्तियां उनकी साधना को जीवन के आचरण से जोड़ती हैं। सत्य की लौ का अर्थ है अपने व्यवहार में ईमानदारी के लिए सजग रहना; प्रेम का संसार बनाने का अर्थ है दूसरों की गरिमा, आवश्यकता और दुःख को समझना। इस दृष्टि से भक्ति मंदिर या पूजा तक सीमित नहीं रहती। वह परिवार और समाज के व्यवहार में भी अत्यंत महत्वपूर्ण ढंग से उतरती है।
कवि की भाषा सहज, आत्मीय और गेय है। ‘भरोसो’, ‘करौं’, ‘तोर’, ‘मोरे’ और ‘नयन’ जैसे शब्द लोकभाषा और ब्रजभाषा की छटा लाते हैं। छोटे वाक्य, लय और नाम-स्मरण की पुनरावृत्ति पदों को गेय बनाती है। गंगा, दीप, प्रभात, रंग और प्रकृति के परिचित बिंब पाठक को कविता के भाव-जगत से जोड़ते हैं। पुस्तक में प्रकृति के बीच कृष्ण-स्मरण का जो चित्र उभरता है-भोर, मोर, पुष्प, पक्षी और जल वह हमें अपने आसपास के संसार को ठहरकर देखने की प्रेरणा देता है।
आज के व्यस्त जीवन में इन पदों की प्रासंगिकता इसी बात में है कि वे हमें मन और संबंधों की ओर लौटने का अवसर देते हैं। सत्संग हमें अपनी संगति पर विचार करने को कहता है; प्रेम का स्वर हमारे भीतर की कोमलता जगाता है और प्रार्थना हमें सत्य तथा सद्गुणों की याद दिलाती है। यदि श्रद्धा हमारे आचरण में विनम्रता, करुणा और सेवा के रूप में दिखाई दे, तो भक्ति जीवन को सार्थक दिशा दे सकती है।
दास नारायण के कृष्ण-भक्ति पद मां से मिले संस्कार, सत्संग की प्रेरणा, आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण को एक साथ व्यक्त करते हैं। उनकी कविता पाठक को केवल कृष्ण का स्मरण नहीं कराती; वह अपने भीतर सत्य की लौ और संबंधों में प्रेम बनाए रखने का संदेश भी देती है। इन पदों का सार यही है कि श्रद्धा मन में बसे और उसका प्रकाश हमारे व्यवहार में दिखाई दे।
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)
