मुख्यपृष्ठस्तंभसटायर : आप दो-आपके दो

सटायर : आप दो-आपके दो

-डाॅ. रवीन्द्र कुमार

परिवार नियोजन के टाइम पर हमारे देश में एक नारा बहुत चला था – हम दो हमारे दो। तब आज की तरह नहीं था। 5-7 बच्चे होना ईश्वर का प्रसाद समझा जाता था। अतः इसीलिए पहले नारा दिया था ‘दो या तीन बच्चे होते हैं घर में अच्छे’। इसमें दिक्कत यह थी कि लोग समझे दो और तीन को जोड़ कर अर्थात पाँच बच्चे करने हैं। यह नई राष्ट्रीय पॉलिसी है। इसके बाद सिर्फ दो बच्चे वाला नारा मार्किट में लाया गया। अब तो ज़माना बिल्कुल बदल गया है। अव्वल तो अब शादी ही नहीं करनी होती। शादी अगर जैसे-तैसे हो भी जाये तो बच्चे नहीं करने। बच्चे करने हैं तो बस एक।
जो बात दो में है वह ना एक में है ना तीन में। आप अपने आसपास नज़र दौड़ाएँ सब चीज़ जोड़े से बोले तो दो होती हैं। दो आँखें, दो हाथ, दो पैर। इससे आगे बढ़ो तो देश-विदेश, रात-दिन, प्रोज-पोयट्री, लेखक-पाठक, दोस्त-दुश्मन। यह दो का अंक ऊपर से ही लिख कर ‘आयेला’ है। इसलिए सब चीज़ आप पाएंगे जोड़े/जोड़ी से ही हैं। क्या जीवन क्या मृत्यु। क्या पति क्या पत्नी, क्या प्रेमी क्या प्रेमिका। आप देखो ना पढ़ाई में भी टैन प्लस टू है। गोया कि इसमें भी दो है। फिर क्या बी.ए. क्या एम.ए. क्या बी.ई., क्या सी.ए.। अब यह गुरु-शिष्य परंपरा है ही ऐसी। क्या क्लास रूम-क्या कोचिंग। ये ‘लड़की तीन कपड़ों में चाहिए’ को भी बदल कर दो कपड़ों में कर देना चाहिए। ओढ़नी अब कौन पहनता है। यह केवल कस्ट्यूम ड्रामा/फिल्मऔर फिल्मी गीतों में रह गयी है। दो ही दिन तो जीवन में सबसे महत्वपूर्ण होते हैं एक दिन इस संसार में आने का दूसरा इस संसार से विदा का। अद्भुत बात ये है कि दोनों के बारे में ही आदमी बेखबर रहता है। ये तो दूसरे ही हैं जो खुशी या ग़म मना रहे होते हैं। अब विपदाओं को ही देख लो या तो सूखा पड़ता है या बाढ़। तीर है तो कमान है। राइफल है तो गोली है। सब जोड़े से है। तलवार है तो म्यान है। डॉ. है तो मरीज़ है।
यह दो का अंक का इतना विकास हुआ है इतना विकास हुआ है कि लोग दो जून की रोटी कमाने को मारे-मारे घूमते हैं। ‘प्रेम गली अति साँकरी जा में दो ना समाय’। किसी को बेकार का साबित करना होता है तो उसे दो कौड़ी का बताया जाता है। यूं कहने को एक कौड़ी का अथवा एक फूटी कौड़ी का भी कहा जा सकता है। पर दो कौड़ी का कहने का ही रिवाज है। यहाँ तक तो ठीक था पर सोचो दो की महिमा कितनी है कि मानहानि के मुकदमे भी दो करोड़ के ही होने लग पड़े हैं हालांकि ये हानि आराम से एक करोड़ अथवा तीन करोड़ की हो सकती थी। पर जो बात दो में है वह एक-डेढ़ में या ढाई-तीन में नहीं। दो की महिमा ही निराली है।

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