शीतल अवस्थी
हिंदू पंचांग का पांचवां महीना यानी सावन (श्रावण) पूरी तरह से भगवान शंकर को समर्पित है। इस महीने में की गई शिव पूजा जीवन भर की गई पूजाओं से भी श्रेष्ठ फल देती है, ऐसा धर्म ग्रंथों में लिखा है। सावन में हर दिन भगवान शिव की विशेष पूजा करने का विधान है। इस प्रकार की गई पूजा से भगवान शिव शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं। सावन में भगवान शिव का पूजन दीप-मालाओं तथा धूप से करना चाहिए। पूजन में चावल, फूल, धतूरा, आंकड़ा, बिल्व पत्र आदि पूजन सामग्री का उपयोग करने से भी शिव प्रसन्न होते हैं। सावन में शिव मंदिर में शाम को दीपक लगाने से अगले जन्म में राजसुख की प्राप्ति होती है।
शिव लिंगाष्टकम्
ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गम्
निर्मलभासितशोभितलिङ्गम्।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गम्
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।
देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गम्
कामदहम् करुणाकरलिङ्गम्।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गम्
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।
सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गम्
बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गम्
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।
कनकमहामणिभूषितलिङ्गम्
फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम्।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गम्
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।
कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गम्
पज्र्जहारसुशोभितलिङ्गम्।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गम्
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।
देवगणार्चितसेवितलिङ्गम्
भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गम्
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।
अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गम्
सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम्।
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गम्
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।
सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गम्
सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् ।
परात्परं परमात्मकलिङ्गम्
तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।
अर्थात-
उस सदाशिवलिंग को मैं प्रणाम करता हूं जो शाश्वत शिव है, जिनकी अर्चना स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवता करते हैं, जो निर्मल, सुशोभित है और जो जन्म के दुखों का विनाश करती है। उस शाश्वत एवं करुणाकर सदाशिवलिंग को मैं प्रणाम करता हूं जिनकी अर्चना देवता, ऋषि-मुनि करते हैं, जिन्होंने कामदेव का दहन किया एवं जिन्होंने रावण के अहंकार को नष्ट किया। उन सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूं जो सदैव सुगंधमय, सुलेपित, बुद्धिवर्धक, सिद्धों, सुरों, असुरों द्वारा पूजित है। उस सदशिवलिंग को प्रणाम करता हूं जो स्वर्ण तथा महामणि से भूषित है, सर्पराज द्वारा शोभित होन के कारण दैदीप्यमान है, दक्षयज्ञ को विनाश करनेवाला है। उस सदशिवलिंग को प्रणाम करता हूं जो कुकुंम, चंदन के लेप से सुशोभित, कमलों के हार से सुसज्जित, संचित पापों के विनाशक है। उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूं जो देवगणों द्वारा अर्चित, सेवित है, जिसे भाव और भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है एवं जो करोड़ों सूर्य के सामान प्रकाशवान है। उस सदशिवलिंग को प्रणाम करता हूं जो अष्टदल से परिवेष्टित, समस्त जगत की उत्पति का कारण, अष्ट दरिद्र का नाशक है। उस सदाशिवलिंग को प्रणाम करता हूं जो देवताओं के गुरु द्वारा, श्रेष्ठ देवताओं द्वारा एवं देवों के वन के पुष्प द्वारा पूजित है, जो परात्पर, परमात्मस्वरूपी लिंग है। जो इस पवित्र लिंगाष्टक को पढ़ता है शिव के सान्निध्य को, शिव लोक को प्राप्त कर शिव के साथ प्रसन्नता को प्राप्त होता है।
