मुख्यपृष्ठस्तंभराज की बात : कितने इंडियन कितने अमेरिकन

राज की बात : कितने इंडियन कितने अमेरिकन

द्विजेंद्र तिवारी, मुंबई

पिछले सप्ताह कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भारत और अमेरिका के बीच तनावपूर्ण संबंधों पर अमेरिका के भारतीय मूल के नागरिकों की ‘आश्चर्यजनक चुप्पी’ पर आश्चर्य व्यक्त किया। उनका प्रश्न था कि भारतीय आप्रवासी इस सब पर इतना चुप क्यों हैं। एक अमेरिकी महिला सांसद ने उन्हें बताया कि उनके कार्यालय में भारतीय हितों का समर्थन करने के लिए एक भी भारतीय आप्रवासी ने फोन नहीं किया। अमेरिका के आप्रवासी भारतीयों पर हमलावर थरूर का कहना है कि अगर आपको अपनी मातृभूमि के साथ रिश्तों की परवाह है, तो आपको इसके लिए लड़ना भी होगा, इसके लिए बोलना भी होगा और अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों पर भारत के लिए खड़े होने का दबाव बनाने के लिए और ज्यादा प्रयास करने होंगे।
चुप्पी क्यों?
हाल के महीनों में, अमेरिकी आव्रजन और व्यापार नीति में नाटकीय बदलावों ने भारत के साथ ही आप्रवासी भारतीयों को सीधे प्रभावित किया है। खबरें हैं कि भारतीयों के खिलाफ ‘हेट क्राइम’ बढ़ गया है। लेकिन गूगल के सुंदर पिचाई सहित सत्या नडेला, शांतनु नारायण, नील मोहन, जयश्री उल्लाल, सबीर भाटिया आदि प्रभावशाली आप्रवासी मौन हैं।
ऐसे में क्या यह अपेक्षा रखनी चाहिए कि आप्रवासी भारतीय हमेशा भारत के हितों की पैरवी करें? किसी अन्य देश का नागरिक बनने के बाद क्या उनकी प्राथमिक निष्ठा उस देश के प्रति होनी चाहिए? पहचान, नागरिकता और राजनीतिक सक्रियता के बीच का तनाव इस बहस के केंद्र में है। तार्किक दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक बार जब व्यक्ति भारत की नागरिकता छोड़कर किसी अन्य देश का नागरिक बन जाता है तो उसकी प्राथमिकता निश्चित तौर पर उस देश के प्रति होती है। उदाहरण के लिए मशहूर गायक अदनान सामी पाकिस्तान की नागरिकता छोड़कर अब भारत के नागरिक हैं। ऐसे में क्या पाकिस्तान को यह अपेक्षा करनी चाहिए कि वह भारत में रहकर पाकिस्तान के हित साधने का काम करें?
निष्ठा की परीक्षा
यही तर्क अमेरिका में नागरिक बन चुके भारतीयों पर भी लागू होता है। उनकी प्राथमिकता अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में अपने अधिकारों, संपत्ति और स्थिति की रक्षा करने की ओर स्थानांतरित हो जाती है। उनके लिए भारतीय हितों के लिए पैरवी करना जोखिम भरा हो सकता है और इसे राष्ट्र विरोधी व विदेशी हस्तक्षेप माना जा सकता है।
समय के साथ प्रवासी समुदाय स्थानीय संस्कृति और स्थानीय राजनीति के साथ तालमेल बिठा लेते हैं। उनकी पहचानें परतदार हो जाती हैं। वे मातृभूमि के मुद्दों पर ध्यान देने की कम जरूरत महसूस कर सकते हैं और उन्हें दूरस्थ या गौण मान सकते हैं।
इस मामले में हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन की प्रमुख सुहाग शुक्ला का दृष्टिकोण उल्लेखनीय है। उन्होंने थरूर की आलोचना का यह तर्क देकर खंडन किया कि आप्रवासी भारतीय हर भारत-अमेरिका विवाद की वकालत करने के लिए बाध्य नहीं हैं और इसके लिए पेशेवर लॉबिस्ट मौजूद हैं।
अपने-अपने हित
सत्ता में आने के बाद से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हर वह पैâसला ले रहे हैं, जो भारत के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। पहले भारी टैरिफ और अब एच१बी वीजा और भारतीय विद्यार्थियों पर कसता शिकंजा उनके खतरनाक इरादे जताता है। पाकिस्तान के प्रति उनका नरम रवैया जले पर नमक छिड़कने जैसा है। ऐसे माहौल में यह स्वाभाविक है कि भारत की सत्ता और जनता अमेरिका के आप्रवासी भारतीयों से सहयोग की उम्मीद रखती है। आप्रवासी भारतीय वहां एक शक्तिशाली सॉफ्ट पावर हैं।
भारतीय नागरिकता छोड़ने के बाद हर भारतीय को उस देश के संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी होती है। अमेरिकी नागरिकता चुनकर भारतीय अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार करते हैं कि उनके प्राथमिक राजनीतिक कर्तव्य अमेरिका में निहित हैं। इससे वे भारत के कम देशभक्त नहीं बन जाते, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि वे हमेशा विदेशों में भारत के पैरवीकार के रूप में काम नहीं कर सकते।
अगर कोई प्रवासी आवाज उठे तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन यह भी समझना होगा कि दूर देशों में रहने वाले लोगों के लिए कभी-कभी चुप्पी क्यों एक तर्कसंगत विकल्प हो जाता है।
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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