शेख फरीद के मुख वाक
विरहा-विरहा आखिये
विरहा तू सुल्तान (सबसे ऊपर)
जिस तन विरहा ना ऊपजे
सो जन जान मसान।
क्या है, क्यों है विरहा?
क्यों सतावे विरहा ?
प्रेम की पराकाष्ठा है विरहा ?
मात्र साथी का वियोग नहीं है विरहा
विरहा होता अपने अराध्य का
उपासक खोजते जिसको
भीड़ में, एकांत में
जंगलों, मरूस्थलों, कंदराओं में
जिसकी तलाश में भूख, प्यास सहते
मान मर्यादा त्यागते
मीरा राधा को है विरहा
विरहा था शिला बनी मात अहिल्या को
मीठे बेर चखाने भीलनी को,
विरहा था चैतन्य प्रभु को
ऐसा ही विरहा था
भक्त जै देव को
लिख दिये अपना विरहा ‘
गीत गोविंद’ में
जिन्हें निरर्थक लगती
अपने श्वासों की माला।
पीड़ा विरहा लागे जिस तन मन
जब तक मिले ना औषध दर्शन
मुदित नयन अश्रुपूरित हो, होते व्याकुल
कण कण खोजें अपने भगवन
क्षुधा, तृष्णा का हो ना भान
हो जाता पिंजर तन
तज देते मर्यादा और मान
रहता न मोह जीवन विरहा में मांगे दर्शन भीख
हो अराध्य से कैसे आत्मसात
मन को मिले दर्शन और शरण।
-बेला विरदी
