विमल मिश्र
मुंबई से अरब के शेखों का नाता पुराना है और दिन-ब-दिन गाढ़ा होता जा रहा है। बीते नवंबर को लोअर परेल के फीनिक्स मॉल में तीन दिनों के आयोजन ‘स्पेक्टैक्युलर सऊदी’ में मुंबईकरों ने सऊदी अरब की समृद्ध संस्कृति, मनोरंजन और मेहमाननवाजी का भरपूर लुत्फ उठाया।
इस बात को बरसों बीत गए। जसलोक अस्पताल में भर्ती एक संबंधी से मिलने उन दिनों काफी आना-जाना होता था। जिस प्राइवेट रूम में यह रिश्तेदार इलाज करा रहा था, उसी मंजिल पर सफेद बुर्का लबादा पहने कुछ लोगों को देखा करता था। ये मरीज या उनके परिचारक अरब से आए पर्यटक थे, जो किफायतशारी और सुविधा के लिहाज से किसी फाइव स्टार होटल में न ठहरकर जसलोक जैसे फाइव स्टार अस्पताल में ठहरा करते थे, जिसके लकदक रूम किसी फाइव स्टार होटल से कम नहीं थे। इस्माइल- जिनसे मेरा परिचय हुआ- भी खाड़ी देशों के एक अरब शेख थे, जो बरसात के इन दिनों पश्चिम एशिया और उत्तरी अप्रâीका के धूल और गर्मी वाले सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, ओमान, कुवैत, यमन, कतर, बहरीन, अल्जीरिया, मोरक्को, लीबिया आदि से दूसरे सैकड़ों पर्यटकों की तरह मुंबई की मशहूर बारिश और हरियाली देखने आए हुए थे।
मुंबई से अरब लोगों का यह नाता न कोई नया है, न अजब। यह वह शहर है, जिसने जिस अरब सागर के किनारे वह बसा है उसका नाम ही उनके नाम से लिया है। भारत के पश्चिमी तट के साथ प्राचीन काल से ही अरबों के व्यापारिक संबंध रहे हैं, बल्कि एक समय अरब सागर के व्यापार पर उनका प्रभुत्व रहा है। मध्ययुगीन काल से ही मुंबई का समृद्ध बंदरगाह पश्चिम एशिया और अरब प्रायद्वीप के साथ सामुद्रिक व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इस्लाम के उदय के बाद से ही अरब व्यापारी भारत के मलबार और पश्चिमी तट पर आने लगे थे। ६३६ में उन्होंने मुंबई के समीपवर्ती ठाणे पर एक असफल नौसैनिक हमला किया, जो उस समय एक प्रमुख बंदरगाह हुआ करता था। ६९९ में कोंकणी मुसलमान-जिनके पूर्वज अरबी थे-अरब इराक के गवर्नर हज्जाज-इब्न-यूसुफ के उत्पीड़न से बचने के लिए यहां आकर बस गए। ९वीं से १६वीं शताब्दी के दौरान और भी अरब और फारसी व्यापारियों ने कोंकण के तटीय शहरों को अपना ठिकाना बनाया। स्थानीय लोगों के साथ विवाह संबंध कायम कर उन्होंने उनकी संस्कृति अपना ली। मुंबई के माहिम पर १४वीं शताब्दी में अरबों का अधिकार था। १४३१ में अरब संत हाजी अली ने हाजी अली दरगाह का निर्माण कराया। १६८९ के आस-पास अरबों ने एक बार फिर जोर दिखाया, जब जंजीरा के सुल्तान सिद्दी याकूत खान ने माहिम किले पर दखल कर लिया। फारस की खाड़ी के साथ १९वीं शताब्दी में दोनों जगहों के बीच व्यापार और बढ़ा, जिसके कारण ईरान के कई शिया व्यापारी भी, जो अरबों के साथ व्यापार करते थे- मुंबई आकर बस गए।
मुंबई के सिद्दी
माथे पर बिंदी, गले में मोटी माला व आंखों में काजल डाले गहरे काले रंग के दढ़ियल, घुंघराले बालों और छोटे कद के इन लोगों को शायद आपने देखा होगा। ये हैं सिद्दी – भारतीय मूल के अप्रâीकी, जिनके एक सुल्तान ने कुछ समय मुंबई के कुछ हिस्सों पर राज भी किया था। ‘सिद्दी’ शब्द अरब ‘सैयद’ का अपभ्रंश बताया जाता है। ये बहादुर लड़ाके अप्रâीका से आए हुए हैं। मुंबई में अंदाजन सिद्दियों के १२५-१५० परिवार अभी भी रहते हैं – सिद्दी मोहल्ला के अलावा दादर, घाटकोपर, जोगेश्वरी और वसई जैसी जगहों पर। आज से कुछ समय पहले तक माहिम दरगाह के सालाना उर्स मुबारक के अवसर पर पुलिस संदल हो चुकने के बाद पहला संदल जंजीरा के सिद्दी नवाब की ओर से ही पेश किया जाता था।
१९७० के दशक से ही मुंबई अरब के लोगों के लिए चुंबक बनी है। तेल की खोज के बाद जैसे-जैसे खाड़ी देशों की समृद्धि बढ़ी यह शहर उनके लिए एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल के रूप में उभरा। मुंबई की बारिश और मौसम ही नहीं, यहां की बिंदास लाइफ, रहन- सहन, हिंदी फिल्में और नाइटलाइफ उनके लिए किसी जादू से कम नहीं थी। पैसा पैसे को खींचता है। मुंबई भारत की वित्तीय राजधानी होने के साथ एशिया का एक प्रमुख वित्तीय केंद्र है। १९७० के दशक में आए ‘आयल बूम’ ने खाड़ी देशों की समृद्धि बढ़ाई और अरब लोग खुशहाल हुए तो मुंबई उनके लिए एक लोकप्रिय तफरीहगाह बन गई। यहां मौजूद व्यापार और निवेश के अवसर संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे मिडिल ईस्ट के धनिकों के कदमों को यहां खींच लाए। धीरे-धीरे अरब भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार बन गए। खाड़ी देशों में काम करने वाली बड़ी भारतीय आबादी और मुंबई में मौजूद उनके वाणिज्य दूतावासों और दुबई व रियाद जैसे अरब शहरों से सीधी उड़ानों ने यह संबंध और प्रगाढ़ कर दिए। अरब फिर यहां सिर्फ घूमने ही नहीं आए, आलीशान घर खरीदकर यहां रहने भी लग गए।
करोड़ों भारतीय ‘दास्तान-ए-अलिफ लैला’ के जरिए अरब जगत को सैकड़ों वर्षों से जानते हैं। सदियों पुराने ऐतिहासिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध होने से भारत के साथ उसके आत्मीयता के रिश्ते हैं। यह रिश्ता समय के साथ विकसित होता गया है। खाड़ी सहयोग परिषद भारत का सबसे बड़ा क्षेत्रीय-ब्लॉक व्यापारिक भागीदार और संयुक्त अरब अमीरात उसका तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। भारत ने इन देशों के साथ रक्षा और नौसेना सहयोग भी बढ़ाया है, जिसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास भी शामिल है। सऊदी अरब जैसे देश पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नियमित रूप से कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, जिनमें सबसे हालिया नवंबर-दिसंबर, २०२५ में मुंबई में हुआ। लोअर परेल के फीनिक्स मॉल में तीन दिनों का आयोजन ‘स्पेक्टैक्युलर सऊदी’ में मुंबईकरों ने सऊदी अरब की समृद्ध संस्कृति, मनोरंजन, संगीत, नृत्य, लजीज खानों और मेहमाननवाजी का भरपूर लुत्फ उठाया। इसमें सऊदी कलाकारों के साथ रंग भरा करीना कपूर, अनन्या पांडे, रकुल प्रीत सिंह, अर्जुन कपूर और कार्तिक आर्यन सरीखे भारतीय फिल्मी सितारों ने। सऊदी टूरिज्म अथॉरिटी ने ऐसे ही आयोजन नई दिल्ली, बंगलुरू, हैदराबाद और अमदाबाद में भी किए, जिनमें दो लाख से ज्यादा लोगों ने अपनी हाजिरी दर्ज की।
रिश्ता जायके का
अरब देशों का वह रिश्ता, जो मुंबई के साथ आज भी अभिन्नता से जुड़ा है वह है स्वाद का। काला घोड़ा सहित फोर्ट, कफ परेड, कोलाबा और भायखला जैसे सैलानी इलाकों में अरबी वेशभूषा में कई पर्यटकों को देखेंगे, जो वहां के लेबनानी, मेडिटेरेनियन और अन्य मध्य-पूर्वी देशों के ‘कहवा’, ‘हुम्मुस’, ‘फलाफेल’, ‘शवरमा’, ‘कबाब’, ‘बकलावा’ और ‘फलाफेल’ सरीखे अरबी खाने परोसने वाले ‘रुए डू लिबान’ व ‘बेरूट’ जैसे होटल और रेस्त्रां में आए हुए होंगे, या फिर कोलाबा कॉजवे की दुकानों में पारंपरिक चीजें और इत्र जैसे परफ्यूम की खरीदारी में मशगूल होंगे। लोअर परेल, शिवड़ी, बांद्रा, कुर्ला, जुहू, अंधेरी, पवई और मालाड जैसी जगहों पर भी ‘पर्सियन दरबार’, ‘अरबाब’, ‘मबरुक’, ‘अरब रेस्त्रां’, ‘फवाफिल’, सरीखे ऐसे कई रेस्त्रां हैं।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
