७० % को अपने ही शरीर से हुई नफरत
सामना संवाददाता / मुंबई
हिंदुस्थान में मोटापे को लेकर बढ़ रहा ‘आंतरिक कलंक’ ज्यादा घातक रूप ले चुका है। वजन नहीं, बल्कि समाज द्वारा फैलाए जा रहे ताने, मीम्स और मजाक हिंदुस्थानियों के आत्मविश्वास को मार रहे हैं। देश में मोटापे पर हुए पहले सर्वे में सामने आई यह तस्वीर बेहद डरावनी है। १४२ लोगों पर किए गए इस अध्ययन में पता चला है कि ७० फीसदी प्रतिभागियों को अपने ही शरीर से नफरत हो गई है। यह ‘वेट शेमिंग’ न केवल उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचा रही है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और व्यक्तिगत क्षमता को भी गहरे स्तर पर प्रभावित कर रही है।
मेटा हिल लेप्रोस्कॉपी एंड बेरियाट्रिक सर्जरी सेंटर द्वारा किए गए इस अध्ययन के अनुसार ७४.६ फीसदी लोग अपने वजन के कारण दुखी रहते हैं। आधे से अधिक प्रतिभागियों ने खुद को कम आकर्षक बताया, जबकि एक-तिहाई ने अपनी क्षमता पर संदेह व्यक्त किया। ४५.८ फीसदी लोगों को लगता है कि उनका वजन रिश्तों में बाधा बन सकता है और कोई आकर्षक व्यक्ति उनसे रिश्ता नहीं रखना चाहेगा। लगभग आधे लोगों को विश्वास है कि अधिक वजन के कारण वे अच्छा सामाजिक जीवन डिजर्व नहीं करते। अध्ययन से सामने आया कि मोटापे से जूझ रहे लोग समाज की नकारात्मक टिप्पणियों और मजाक को अपने अंदर उतार लेते हैं। इस स्थिति को ‘आंतरिक वजन भेदभाव’ कहा जाता है। जो अवसाद, चिंता, उदासी, कम आत्मसम्मान, नकारात्मक शारीरिक छवि और अस्वस्थ भोजन व्यवहार जैसी समस्याओं को और बढ़ा देता है। द बर्डन प्रâोम विदिन एन इंडियन पायलट स्टडी ऑन वेट बेस इंटरनलाइजेश शीर्षक से यह अध्ययन आईएफएसओ की अंतरराष्ट्रीय जर्नल ओबेसिटी सर्जरी में प्रकाशित हुआ है।
यह है वजन भेदभाव
वजन भेदभाव वह नकारात्मक रवैया है जिसमें मोटापे से ग्रस्त व्यक्तियों को आलसी, अयोग्य और इच्छाशक्ति की कमी वाला माना जाता है। समाज मोटापे को व्यक्तिगत असफलता से जोड़ देता है, जिससे सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव बढ़ता है। यही व्यवहार आगे चलकर मोटापा-कलंक का रूप ले लेता है।
अध्ययन के प्रमुख तथ्य
अध्ययन में कुल १४२ प्रतिभागी शामिल ह्यूज जिसमें ७८.९ फीसदी महिलाएं थी। सर्वे के अनुसार ७१.१ फीसदी प्रतिभागियों में उच्च स्तर का आंतरिक कलंक पाया गया। युवा और उच्च बीएमआई वाले व्यक्तियों में यह भावना और अधिक थी।
