कविता श्रीवास्तव
सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के झूठे वादे के आधार पर दर्ज दुष्कर्म के एक मामले को रद्द करते हुए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। यह पैâसला आधुनिक रिश्तों, सामाजिक मूल्यों और कानून की सीमाओं को समझने के लिहाज से बेहद अहम है। खासकर शादी के वादे से जुड़े विवादों पर यह एक ठोस सामाजिक संकेत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हर असफल रिश्ता, टूटा भरोसा या विवाह न हो पाना आपराधिक कृत्य नहीं बन जाता। आज हम देख रहे हैं कि नई पीढ़ी में आपसी सहमति से साथ रहने का चलन बढ़ा है। शहरीकरण, शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता ने युवाओं की सोच और जीवनशैली को गहराई से प्रभावित किया है। इसी बदलाव के साथ लिव-इन रिलेशनशिप का चलन भी बढ़ा है। हालांकि, भारतीय परंपरा में वैवाहिक संबंध केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों के जुड़ाव का माध्यम माने जाते रहे हैं, जहां परिवार, रिश्तेदार और सामाजिक स्वीकृति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके विपरीत, लिव-इन रिश्तों में दो वयस्क अपनी स्वतंत्र इच्छा और सहमति से संबंध में रहते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब ऐसे रिश्तों में मतभेद या अलगाव की स्थिति बनती है। कई बार संबंध टूटने के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है। हाल के वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जहां लंबे समय तक चले संबंधों के टूटने के बाद दुष्कर्म के आरोप लगाए गए। ऐसे मामलों में अदालतों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे वास्तविक शोषण और आपसी सहमति से बने संबंधों के विफल होने के बीच स्पष्ट अंतर करें।
इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपसी सहमति के आधार पर लंबे समय तक चले संबंध को केवल उसके अंत के कारण दुष्कर्म का मामला नहीं माना जा सकता। कोर्ट के इस पैâसले में यह स्पष्ट संदेश है कि तेजी से बदलते रिश्तों के दौर में कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। यह भी समझना होगा कि रिश्ते बनाना जितना आसान दिखता है, उन्हें निभाना और टिकाए रखना उतना ही कठिन होता है। इसके लिए जिम्मेदारी, स्पष्टता और परिपक्वता आवश्यक है। रिश्ते विश्वास पर टिके होते हैं। जब विश्वास टूटता है तो पीड़ा स्वाभाविक है, लेकिन हर भावनात्मक विफलता को आपराधिक विवाद का रूप देना न्याय व्यवस्था के मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकता है। इसीलिए यह पैâसला कानून और समाज दोनों के लिए संतुलन का संकेत है। एक ओर यह उन लोगों को राहत देता है जो आपसी सहमति वाले रिश्तों के टूटने के बाद झूठे मुकदमों का सामना करते हैं, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट करता है कि यदि शुरुआत से ही धोखा, छल या शोषण की मंशा साबित होती है, तो कानून सख्ती से कार्रवाई करेगा। इसलिए संबंध बनाने वाले समझ लें कि रिश्तों की स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। सहमति, सम्मान और ईमानदारी ही किसी भी रिश्ते की असली नींव है।
