मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : कितना कैद रखोगे, ट्रायल तो करो!

तड़का : कितना कैद रखोगे, ट्रायल तो करो!

कविता श्रीवास्तव

न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा सिद्धांत है कि किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक अदालत में उसका अपराध साबित न हो जाए। लेकिन कोई वर्षों तक कैद में रहे और उसके मुकदमे की सुनवाई आगे न बढ़े, तो स्वाभाविक सवाल है कि आखिर उसे कब तक कैद मैं रखा जाएगा? सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने इसी गंभीर मुद्दे को उठाया है। अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को फटकारते हुए कहा कि एक तरफ राज्य आरोपी की जमानत का विरोध करता है, लेकिन दूसरी तरफ मुकदमों को समय पर पूरा कराने की जिम्मेदारी निभाने में पीछे रह जाता है। अदालत ने इसे राज्य का ‘डबल स्टैंडर्ड’ बताया है। इससे आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं। दरअसल, यह देश की पूरी आपराधिक न्याय व्यवस्था से जुड़ा सवाल है। संविधान का अनुच्छेद २१ हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। कई अदालतों ने कहा है कि त्वरित सुनवाई का अधिकार भी जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। न्याय में देरी भी अन्याय है। महाराष्ट्र के एक मामले में आरोपी २०२२ से जेल में है। आरोपपत्र में ४५ गवाहों का उल्लेख है लेकिन केवल दो गवाहों के बयान दर्ज हुए हैं। यदि राज्य जमानत का विरोध कर रहा है, तो उसकी जिम्मेदारी भी है कि वह मुकदमे को जल्दी पूरा करवाए। गंभीर अपराधों में कठोर कार्रवाई जरूरी है। अपराधियों को कानूनी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन किसी आरोपी को केवल इसलिए वर्षों तक जेल में नहीं रखा जा सकता कि मुकदमे की प्रक्रिया धीमी चल रही है। देश की जेलों में बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदी हैं। कई ऐसे भी हैं जिनका अपराध साबित ही नहीं हुआ है। अगर जांच, गवाहों की पेशी, अभियोजन की तैयारी और सुनवाई में वर्षों लगते हैं तो इसका असर कैदियों की जिंदगी पर पड़ता है। उनका परिवार टूटता है, रोजगार छूटता है और सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है। सरकार की जिम्मेदारी केवल अपराध रोकना नहीं है, बल्कि न्याय प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाना भी है। पुलिस, अभियोजन विभाग और न्यायालयों के बीच तालमेल बेहतर हो ताकि मुकदमे वर्षों तक लंबित न रहें। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को न्याय व्यवस्था को सुधारने की चेतावनी समझा जाना चाहिए। मजबूत सरकार वही है जो अपराध के खिलाफ सख्त हो, लेकिन संविधान में दिए गए अधिकारों का सम्मान भी करे। आम नागरिक का भरोसा तभी कायम रहेगा जब उसे यह विश्वास होगा कि कानून कठोर भी है और न्यायपूर्ण भी। सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है कि किसी को अनिश्चित समय तक कैद रखना न्याय नहीं है। अपराध साबित करो, ट्रायल पूरा करो और समय पर फैसला दो। क्योंकि न्याय में देरी, कई बार न्याय से इनकार करने के बराबर होती है।

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