कविता श्रीवास्तव
गर्मी अब सिर्फ मौसम की परेशानी नहीं है, यह पूरी दुनिया के लिए जानलेवा चुनौती बन गई है। एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2026 की भीषण गर्मी के कारण यूरोप में करीब 50 हजार अतिरिक्त मौतें होने का अनुमान है। इनमें लगभग दो-तिहाई मौतों के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार माना गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से बढ़ते वैश्विक तापमान ने गर्मी के प्रभाव को और गंभीर बनाया है। इंपीरियल कॉलेज लंदन और लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने 30 यूरोपीय देशों के 854 शहरी इलाकों के तापमान और मृत्यु दर से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया। ये आंकड़े बताते हैं कि बढ़ता तापमान मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा है। यह स्थिति भारत के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। देश के कई हिस्सों में गर्मी का प्रकोप लोगों के स्वास्थ्य और सामान्य जनजीवन को प्रभावित करता है। तापमान बढ़ने के साथ लू, शरीर में पानी की कमी और हीट स्ट्रोक जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ता है। ऐसे में बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बीमार व्यक्तियों और खुले में काम करने वाले मजदूरों को अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। इस वर्ष अल नीनो की संभावित भूमिका को लेकर भी चिंता बनी हुई है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। ऐसे में मौसम विभाग की चेतावनियों पर ध्यान देना, पर्याप्त पानी पीना, दोपहर की तेज धूप से बचना और जरूरतमंद लोगों की मदद करना बेहद जरूरी है। जानकार हमेशा कहते हैं कि गर्मी के बढ़ते प्रकोप के पीछे जलवायु परिवर्तन एक महत्वपूर्ण कारण है। जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक इस्तेमाल, जंगलों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन पर्यावरण पर दबाव बढ़ाते हैं। शहरों में पेड़ों और खुले स्थानों की कमी तथा कंक्रीट की बढ़ती इमारतों के कारण तापमान बढ़ता है। इस तरह प्रकृति के साथ मनुष्य की छेड़छाड़ अब उसी के जीवन पर भारी पड़ने लगी है। विकास के नाम पर यदि जंगल उजाड़े जाएंगे, नदियों और जलस्रोतों को नुकसान पहुंचाया जाएगा और हरियाली लगातार कम होती जाएगी, तो इसके परिणाम भी गंभीर होंगे। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाना और उनकी देखभाल करना, बिजली और पानी की बचत करना, सार्वजनिक परिवहन अपनाना, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना और प्लास्टिक तथा संसाधनों की अनावश्यक खपत कम करना जरूरी है। याद रखना होगा कि प्रकृति के बिना मनुष्य का अस्तित्व संभव नहीं, लेकिन मनुष्य के बिना भी प्रकृति अपना संतुलन खोज सकती है। इसलिए प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर चलना ही होगा। जरुरी है कि हम गर्मी से बचें और आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण अनुकूल धरती सौंपें। हम आज नहीं संभले, तो अपने वर्तमान स्वास्थ्य, जीवन के साथ ही बच्चों के भविष्य पर भी संकट बना रहेगा। पर्यावरण की रक्षा ही मानव अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है।
