विजयशंकर चतुर्वेदी
हाल में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की एक बैठक में राहुल गांधी ने अपने सहयोगियों को साफ संकेत दिया था, यदि विपक्ष आज की राजनीतिक चुनौती को पुराने चुनावी चश्मे से देखता रहेगा तो वह अपने छोटे-छोटे किले तो बचा सकता है, लेकिन बड़े युद्ध में हार सकता है।
यही आज भारतीय विपक्ष का सबसे बड़ा संकट है। वह अपनी कमजोरियों का ईमानदार विश्लेषण करने से बचता है। लोकतंत्र में किसी राजनीतिक दल का मजबूत होना कोई अपराध नहीं है। भाजपा वही कर रही है जो कोई भी सफल और आक्रामक राजनीतिक संगठन करता है- अपने संगठन को विस्तार देना, अपने विरोधियों की कमजोरियों का लाभ उठाना और अपने राजनीतिक भूगोल को लगातार बढ़ाना। इसलिए हर पराजय का दोष केवल सत्ता, संसाधनों, एजेंसियों या प्रचार तंत्र पर डाल देना आत्मसंतोष का आसान रास्ता हो सकता है, राजनीति का समाधान नहीं।
विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि उसके सामने सिर्फ चुनाव जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि उसका एक ऐसे राजनीतिक संगठन से मुकाबला है जिसने बूथ स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपनी संरचना को मजबूत कर लिया है। इस चुनौती का मुकाबला व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और प्रांतीय / क्षेत्रीय अहंकार से नहीं किया जा सकता।
उत्तर प्रदेश: इतिहास की सबसे बड़ी सीख
उत्तर प्रदेश का इतिहास विपक्ष के लिए सबसे बड़ा सबक है। १९९३ में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने साथ आकर भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया था। उस समय यह गठबंधन सामाजिक समीकरणों की दृष्टि से लगभग अजेय माना गया। लेकिन १९९५ के गेस्ट हाउस कांड ने ऐसी दरार पैदा की जिसका लाभ भाजपा ने अगले दो दशकों तक उठाया। आखिरकार २०१९ में सपा, बसपा और रालोद फिर एक साथ आए। कागजों पर यह गठबंधन बेहद मजबूत दिखता था। उसे लगभग ३९.२ प्रतिशत मत मिले, लेकिन वह सिर्फ १५ सीटों तक सीमित रहा। दूसरी तरफ भाजपा नीत गठबंधन ने ५१ प्रतिशत से अधिक वोट लेकर ६४ सीटें जीत लीं। क्योंकि तब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका था।
लेकिन २०२४ में जब सपा और कांग्रेस ने अपेक्षाकृत समय रहते तालमेल किया तो उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन को ४३ सीटें मिलीं और भाजपा का आंकड़ा ३३ सीटों तक सिमट गया। यह बताता है कि राजनीति में सही समय पर गठबंधन और जमीन पर कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल भी आवश्यक होता है।
बिहार और महाराष्ट्र से सबक
बिहार लंबे समय तक सामाजिक न्याय की राजनीति का केंद्र रहा। लेकिन बार-बार बदलते समीकरणों और नेतृत्व के बीच अविश्वास ने विपक्ष की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया। २०२४ के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने बिहार की ४० में से ३० सीटें जीतकर यह साबित किया कि बिखरा हुआ विपक्ष मजबूत सामाजिक आधार होने के बावजूद सत्ता को चुनौती नहीं दे सकता।
महाराष्ट्र की कहानी और भी दिलचस्प है। २०१९ के विधानसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र की राजनीति ने जिस प्रकार करवट ली, उसने एक बड़ा संदेश दिया कि राजनीति में कोई भी दल केवल अपनी पुरानी ताकत के भरोसे सुरक्षित नहीं रह सकता। यदि आपके सामने कोई ऐसी राष्ट्रीय शक्ति है जिसकी रणनीति दीर्घकालिक है तो विपक्ष को भी अपने तात्कालिक लाभ से आगे की सोच रखनी होगी।
पड़ोसी की हार आपकी जीत नहीं होती
भारतीय विपक्ष की सबसे बड़ी भूल यही रही है कि वे अपने सबसे नजदीकी प्रतिद्वंद्वी को ही अपना सबसे बड़ा शत्रु मान लेते हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस-वाम दलों की आपसी लड़ाई ने भाजपा को सत्ता पर कब्जा करा दिया। पंजाब और दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के रिश्तों की अस्थिरता ने एक व्यापक राष्ट्रीय संदेश को कमजोर किया। कांग्रेस और वामपंथी दल राष्ट्रीय स्तर पर सहयोगी हैं, लेकिन केरल में एक-दूसरे के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी। प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रीय चुनौती के सामने भी विपक्ष अपने-अपने क्षेत्रीय गणित से ऊपर उठने को तैयार है? केरल को लेकर राहुल गांधी के वाक्य से नकारात्मक ही संदेश गया है।
क्या अकेले राहुल गांधी काफी हैं?
यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा और न्याय यात्रा के माध्यम से विपक्षी राजनीति को सड़क पर वापस लाने की कोशिश की। विपक्षी दलों के बीच संवाद बनाए रखने और ‘इंडिया’ गठबंधन को एक सूत्र में पिरोने की भूमिका भी निभाई है। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक संघर्ष की सफलता केवल एक व्यक्ति की ऊर्जा पर नहीं टिकी रह सकती। असली प्रश्न यही है कि क्या बाकी विपक्ष भी उतनी ही गंभीरता से इस लड़ाई को समझ रहा है?
क्या विपक्ष समय रहते जागेगा?
आज विपक्ष के सामने विकल्प स्पष्ट है या तो वह अपने-अपने राज्यों के छोटे राजनीतिक साम्राज्यों की रक्षा करता रहे और धीरे-धीरे राष्ट्रीय परिदृश्य से सिकुड़ता जाए, या फिर अपने अहंकार, अविश्वास और क्षणिक लाभों से ऊपर उठकर एक विश्वसनीय राष्ट्रीय विकल्प बनने का साहस दिखाए। क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता का अहंकार जितना खतरनाक होता है, उतना ही खतरनाक विपक्ष का आत्मभ्रम भी होता है।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार, कवि-लेखक)
