मनमोहन सिंह
(आज 21 मई अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस है, एक गुफ्तगू चाय के साथ)
टेबल पर केतली है और केतली में गरमा-गरम चाय। कप खाली है… पशोपेश में हूं, चाय पियूं या नहीं! अचानक आवाज गूंजती है… मैं हैरान हूं, यह किसकी आवाज़ है?
चाय: ‘क्या बात है? आज तुमने मेरी तरफ देखा भी नहीं! सुबह उठते ही मुझे ढूंढने वाले तुम आज इतने शांत क्यों हो? कोई परेशानी है क्या?’
मैं: ‘वाकई, आज तबीयत थोड़ी नासाज है, नॉट फीलिंग वेल। पर असल बात यह है कि आज मुझे किसी ने टोक दिया कि चाय सेहत के लिए ठीक नहीं है। बस, इसी उलझन में था…’
चाय: ‘अरे, तो इतनी सी बात पर अपनी इस “मोहब्बत” से मुंह फेर लिया? चलो, आज जरा वैज्ञानिक, आयुर्वेदिक और मानसिक चश्मे से हमारा एनालिसिस करते हैं। विज्ञान कहता है कि मुझमें कैफीन और एल-थिएनाइन का अनोखा कॉम्बिनेशन है। कैफीन दिमाग की सुस्ती दूर कर डोपामाइन बढ़ाता है और एल-थिएनाइन मन को शांत और एकाग्र करता है। यानी मैं तुम्हें अलर्ट भी रखती हूं और रिलैक्स भी!’
मैं: ’…और आयुर्वेद हमारी परंपरा में तुम्हारे बारे में क्या कहता है?’
चाय: ‘आयुर्वेद के नजरिए से मैं मूल रूप से एक जड़ी-बूटी हूं। जब तुम मुझमें अदरक, तुलसी, काली मिर्च या इलायची मिलाते हो, तो मैं “दीपन” और “पाचन” का काम करती हूं। मैं शरीर की अग्नि प्रदीप्त कर कफ और वात का नाश करती हूं। बस, शर्त इतनी है कि मुझे खाली पेट बहुत ज्यादा न उबाला जाए और दूध-चीनी का संतुलन सही हो।’
मैं: ‘पर लोग कहते हैं कि तुम्हारी लत बहुत बुरी है। सुबह तुम न मिलो, तो सिर फटने लगता है।’
चाय: ‘देखो, “अति सर्वत्र वर्जयेत्” यानी अति तो अमृत की भी बुरी होती है! रोज एक तय समय पर कैफीन न मिलने से सेंट्रल नर्वस सिस्टम सुस्त होता है, जिसे तुम सिरदर्द कहते हो। दिनभर में 6-7 कप पियोगे, तो मैं एसिडिटी और अनिद्रा ही दूंगी। संतुलन में ही समझदारी है।’
मैं: ‘बात तो तुम सही कह रही हो। वैसे आजकल तो तुम्हारे बड़े रूप देखने को मिलते हैं, ग्रीन टी, ब्लैक टी, हर्बल टी, माचा, कैमोमाइल… इतने प्रकार!’
चाय: ‘हां, बदला हुआ जमाना है न! अगर किसी को दूध-चीनी से दिक्कत है, तो वह ग्रीन टी या हर्बल टी पी सकता है, जिसमें भरपूर एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो दिल और त्वचा के लिए बेहतरीन हैं। अब बताओ, क्या अभी भी मुझसे दूर रहोगे?’
मैं: ‘नहीं! अब तो मुझे तुम्हें पीना ही पड़ेगा। आखिर तुम सिगरेट, शराब और अन्य नशीले व्यसनों से तो हजार गुना बेहतर हो। वे चीजें शरीर और समाज दोनों को बर्बाद करती हैं, जबकि तुम तो सिर्फ अपनों को करीब लाती हो। माना कि एडिक्शन हर चीज का बुरा होता है, पर तुम्हारी यह लत इतनी भी बुरी नहीं।’
मैंने कप उठाया, गरम चाय की पहली चुस्की ली और एक सुकून भरी मुस्कान चेहरे पर आ गई…
मैं: ‘अहा! अद्भुत! सच कहूं तो… तुम बहुत अच्छी हो, बिल्कुल मेरी मोहब्बत जैसी हो, और मेरी जिंदगी भी तुम्हारे जैसी ही कड़क, मीठी और खुशबूदार है!’
चाय: ‘सुनो डियर, रिश्ते और चाय… दोनों को जितनी धीमी आंच पर पकाओगे, स्वाद उतना ही लाजवाब आएगा।’
कभी-कभी लगता है, मोहब्बत और चाय में एक अजीब-सी समानता है। दोनों में थोड़ा सब्र चाहिए होता है। जैसे चाय को बेहतरीन बनाने के लिए उसे धीमी आंच पर उबलने देना पड़ता है, ठीक वैसे ही मोहब्बत को मुकम्मल करने के लिए भी वक्त की आंच पर तपना पड़ता है। जल्दबाजी में न तो चाय का स्वाद निखरता है और न ही मोहब्बत का रंग गहरा होता है।
शायरों की महफिल हो या किसी नुक्कड़ की टपरी, जहां मोहब्बत की बातें होती हैं, वहां चाय का एक कुल्हड़ अपने आप खिंचा चला आता है।
चाय को ‘चाय’ बनाने का श्रेय एक सम्राट को जाता है। कहानी है हिंदुस्तान के पड़ोसी चीन की। वह सम्राट था चीन का! लेकिन चाय को भी श्रेय जाता है एक आम इंसान को ‘सम्राट’ बनाने का। कहानी है चीन के पड़ोसी हिंदुस्तान की… यह कहानी फिर कभी!
