तौसीफ कुरैशी
राजनीति में नेतृत्व केवल भाषणों से नहीं बनता। नेतृत्व का असली प्रमाण तब मिलता है जब नेता अपने संगठन को अनुशासित रख सके, अपने निर्णयों को लागू करा सके और संकट की घड़ी में अपने लोगों को एक दिशा में खड़ा कर सके। राहुल गांधी के सामने आज ऐसा ही एक अवसर खड़ा है।
वोटों पर भरोसा
राज्यसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा की है। कहा जा रहा है कि इनमें से एक उम्मीदवार के चयन में राहुल गांधी ने अपनी निर्णायक भूमिका निभाई है। यदि यह सच है तो अब उस निर्णय को सफल बनाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है। राजनीति में अधिकार और उत्तरदायित्व अलग-अलग नहीं चलते। जो निर्णय लेता है, उसे परिणाम की जवाबदेही भी उठानी पड़ती है। मध्य प्रदेश का गणित कांग्रेस के पक्ष में दिखाई देता है। कांग्रेस के पास इस समय ६३ ऐसे विधायक हैं जो मतदान के पात्र हैं। जीत के लिए ५८ वोटों की आवश्यकता है। यानी पांच वोट अतिरिक्त हैं। फिर भी यदि हार की चर्चा हो रही है तो उसका कारण अंकगणित नहीं, राजनीति है। सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस के पास कितने वोट हैं। सवाल यह है कि कांग्रेस अपने वोटों पर कितना भरोसा करती है। भाजपा ने अपना उम्मीदवार क्यों उतारा? भाजपा राजनीति में अनावश्यक जोखिम नहीं लेती। उसे जीत के लिए अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता है। वे वोट उसके पास नहीं हैं। तब उसकी उम्मीद स्वाभाविक रूप से विपक्ष के भीतर की कमजोरी पर टिकती है।
राहुल की परीक्षा
भाजपा को यदि किसी पर भरोसा है तो वह कांग्रेस की संगठनात्मक ढील पर है, कांग्रेस के भीतर मौजूद असंतोष पर है और उस संस्कृति पर है, जिसमें क्रॉस वोटिंग कोई असाधारण घटना नहीं रह गई है। हरियाणा में ऐसा हुआ। हिमाचल प्रदेश में हुआ। बिहार में हुआ। ओडिशा में हुआ। अनेक राज्यों में कांग्रेस के विधायक पार्टी लाइन से हटकर मतदान करते रहे हैं। हर बार कुछ विधायक दोषी ठहराए जाते हैं, कुछ निलंबन होते हैं, कुछ बयान आते हैं और फिर मामला ठंडा पड़ जाता है। लेकिन यह कभी नहीं पूछा जाता कि एक विधायक अकेले निर्णय नहीं लेता। उसके पीछे अक्सर कोई बड़ा नेता, कोई गुट, कोई संरक्षक होता है। कार्रवाई नीचे होती है, संदेश ऊपर तक नहीं पहुंचता।
यहीं राहुल गांधी की परीक्षा है। पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी ने अपनी राजनीति की एक अलग पहचान बनाई है। भारत जोड़ो यात्रा हो या सामाजिक न्याय का प्रश्न, उन्होंने वैचारिक लड़ाई को नई ऊर्जा दी है। विपक्षी राजनीति में आज बहुत से लोग उन्हें स्वाभाविक धुरी के रूप में देखने लगे हैं। इंडिया गठबंधन के भीतर भी उनकी भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हुई है। लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व का दावा केवल जनता के बीच संघर्ष से पूरा नहीं होता। वह अपनी पार्टी के भीतर व्यवस्था कायम करने से भी सिद्ध होता है।
यदि राहुल गांधी को कांग्रेस का निर्विवाद नेता बनना है तो उन्हें यह दिखाना होगा कि पार्टी का निर्णय अंतिम है। यदि किसी विधायक ने क्रॉस वोटिंग की तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। और यदि किसी बड़े नेता के संरक्षण में ऐसा हुआ तो कार्रवाई उस नेता तक भी पहुंचेगी। अनुशासन केवल कमजोर लोगों के लिए नहीं होता। संगठन तभी मजबूत बनता है जब नियम सब पर समान रूप से लागू हों।
एक बड़ा अवसर
कांग्रेस लंबे समय तक एक ऐसी पार्टी रही, जिसमें वैचारिक विविधता भी थी और संगठनात्मक अनुशासन भी। मतभेद होते थे, बहसें होती थीं, लेकिन अंतिम निर्णय के बाद पार्टी एकजुट दिखाई देती थी। पिछले वर्षों में यह क्षमता कमजोर हुई है। इसका राजनीतिक नुकसान भी कांग्रेस ने बार-बार उठाया है। मध्य प्रदेश का यह चुनाव केवल एक राज्यसभा सीट का चुनाव नहीं है। यह राहुल गांधी के नेतृत्व की एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण परीक्षा है। यदि कांग्रेस अपने निर्धारित वोटों को सुरक्षित रख लेती है तो संदेश जाएगा कि पार्टी ने अपने भीतर की कमजोरी पर काबू पाना शुरू कर दिया है। लेकिन यदि फिर क्रॉस वोटिंग होती है तो विपक्ष के सबसे बड़े दल के रूप में कांग्रेस की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठेंगे। नेतृत्व का अर्थ केवल लोकप्रिय होना नहीं है। नेतृत्व का अर्थ है निर्णय लेना और उसे लागू कराना। स्नेह और संवाद आवश्यक हैं, लेकिन संगठन केवल उनसे नहीं चलता। कभी-कभी स्पष्टता और कठोरता भी दिखानी पड़ती है। राहुल गांधी के सामने आज वही क्षण है। यदि वे एक स्पष्ट और कठोर संदेश देते हैं, और उस संदेश का पालन भी कराते हैं तो शायद कांग्रेस के भीतर एक नई राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत हो सकती है। राजनीति में कई बार बड़े बदलाव छोटे अवसरों से शुरू होते हैं। मध्य प्रदेश का यह चुनाव ऐसा ही एक अवसर है।
सत्यमेव जयते
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
