शीतल अवस्थी
-भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की होती है पूजा; १४ गांठों वाला अनंत सूत्र जीवन में सुख-समृद्धि का प्रतीक
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी मनाई जाती है। यह तिथि भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत करने पर मनुष्य के कष्ट दूर होते हैं तथा उसे सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसी दिन गणेशोत्सव का समापन और गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है। इस कारण महाराष्ट्र सहित देश के अनेक हिस्सों में अनंत चतुर्दशी का विशेष महत्व है।
१४ गांठों वाला अनंत सूत्र
इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा के बाद रेशम अथवा सूती धागे से बना अनंत सूत्र धारण किया जाता है। इसमें १४ गांठें लगाई जाती हैं। ये गांठें भगवान विष्णु द्वारा निर्मित चौदह लोकों—भू, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य तथा सात अधोलोकों-का प्रतीक मानी जाती हैं। पूजा के बाद पुरुष अनंत सूत्र को दाहिनी भुजा और महिलाएं बाईं भुजा में बांधती हैं। मान्यता है कि इसे धारण करने से भगवान अनंत की कृपा प्राप्त होती है और संकटों से रक्षा होती है।
अनंत चतुर्दशी की पूजा-विधि
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। पूजा-स्थान को साफ करके कलश स्थापित करें। कलश पर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की प्रतिमा या चित्र रखें। भगवान को पंचामृत, चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसीदल, धूप और दीप अर्पित करें। इसके बाद १४ गांठों वाले अनंत सूत्र को हल्दी अथवा कुमकुम से रंगकर भगवान के सामने रखें। पूजा के दौरान ‘ॐ अनंताय नमः’ मंत्र का जाप करें और अनंत चतुर्दशी की कथा सुनें। भगवान को मीठे पकवान का भोग लगाया जाता है। कुछ परंपराओं में १४ पूड़ियां और १४ मालपुए अर्पित करने का विधान है। पूजा पूरी होने के बाद अनंत सूत्र बांधा जाता है और प्रसाद वितरित किया जाता है।
पांडवों से जुड़ी पौराणिक मान्यता
महाभारत की कथा के अनुसार, जुए में राजपाट हारने के बाद पांडव वनवास में कठिन जीवन व्यतीत कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को अनंत चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी। श्रीकृष्ण ने बताया कि अनंत भगवान विष्णु का ही स्वरूप हैं और उनकी आराधना से संकट दूर हो सकते हैं।
युधिष्ठिर और उनके भाइयों ने विधिपूर्वक व्रत किया। मान्यता है कि इसके प्रभाव से उनके कष्टों का अंत हुआ और उन्हें अपना राज्य पुनः प्राप्त हुआ।
इस व्रत को लगातार १४ वर्षों तक करने की परंपरा भी है। चौदहवें वर्ष में उद्यापन करके ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन तथा दान दिया जाता है। अनंत चतुर्दशी का संदेश है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, श्रद्धा, धैर्य और धर्म के मार्ग पर बने रहने से संकटों का अंत संभव है। भगवान विष्णु का ‘अनंत’ स्वरूप उस शक्ति का प्रतीक है जिसका न कोई आरंभ है और न अंत।
