सना खान
प्याज की कीमत बढ़ते ही उसका असर सीधे रसोई के बजट पर दिखाई देता है। लेकिन महाराष्ट्र में इस बार बढ़े दाम केवल महंगाई की एक और खबर नहीं हैं। इसके पीछे एक बड़ा सवाल है कि जब देश में प्याज का उत्पादन लगभग पिछले साल के बराबर है तो कीमतों में इतना उछाल क्यों आया। नासिक के लासलगांव में २५ अगस्त को प्याज का भाव ४,२५० रुपए प्रति क्विंटल से ऊपर पहुंच गया। यानी थोक स्तर पर कीमत करीब ४२.५० रुपए प्रति किलो रही। बाजार में आवक कम होना इस तेजी की प्रमुख वजहों में माना जा रहा है।
५९ फीसदी की छलांग
२४ अगस्त के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में प्याज की औसत खुदरा कीमत ४३.५३ रुपए प्रति किलो पहुंच गई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह २७.३७ रुपए प्रति किलो थी। यानी एक साल में कीमत १६.१६ रुपए प्रति किलो से लगभग ५९ फीसदी बढ़ी। थोक बाजार में औसत कीमत ३५.५८ रुपए प्रति किलो रही, जो पिछले वर्ष के २१.२३ रुपए प्रति किलो से करीब ६८ फीसदी अधिक है। इन आंकड़ों के पीछे सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि बाजार में प्याज की उपलब्धता का सवाल भी छिपा है।
प्याज है, फिर महंगा क्यों?
यहीं कहानी का असली मोड़ है। प्याज की समस्या हमेशा उत्पादन की कमी नहीं होती। कई बार फसल मौजूद होती है, लेकिन जिस समय किसी क्षेत्र में मांग बढ़ती है, उस समय वहां पर्याप्त मात्रा में प्याज नहीं पहुंच पाता। महाराष्ट्र के नासिक क्षेत्र की मंडियां देश के प्याज व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यहां की आवक में बदलाव का असर दूसरे राज्यों के बाजारों पर भी पड़ सकता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि कितना प्याज पैदा हुआ? सवाल यह भी है कि कब, कहां और कितनी मात्रा में प्याज उपलब्ध हुआ?
‘कांदा एक्सप्रेस’ क्यों चली?
बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र से प्रमुख उपभोक्ता बाजारों तक प्याज पहुंचाने के लिए ‘कांदा एक्सप्रेस’ शुरू की है। बफर स्टॉक से प्याज निकालकर अतिरिक्त आपूर्ति बाजार तक पहुंचाने की कोशिश हो रही है। कुछ स्थानों पर नियंत्रित बिक्री के तहत प्याज ३५ रुपए प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराने की योजना है। २०२५-२६ में ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए करीब ८८,००० टन प्याज ८६ रेल रेक से १६ शहरों तक पहुंचाया गया था।
यह सिर्फ परिवहन की खबर नहीं है। यह बताता है कि प्याज की कीमतों को नियंत्रित करने में तेजी से एक बाजार से दूसरे बाजार तक आपूर्ति पहुंचाना कितना महत्वपूर्ण हो गया है।
किसान को कितना मिला?
बाजार में प्याज ४०-४५ रुपए किलो बिकने का अर्थ यह नहीं कि किसान को भी उसी अनुपात में कीमत मिल रही है। खेत से उपभोक्ता तक पहुंचने के दौरान मंडी, छंटाई, भंडारण, परिवहन और वितरण जैसे कई चरण जुड़ते हैं। यही वह जगह है, जहां सवाल उठता है कि उपभोक्ता की जेब से निकलने वाला पैसा और किसान तक पहुंचने वाली रकम के बीच इतना अंतर क्यों है? किसान को बेहतर मूल्य और उपभोक्ता को उचित कीमत दोनों लक्ष्य एक साथ हासिल करने के लिए पूरी आपूर्ति शृंखला को अधिक पारदर्शी बनाना जरूरी है।
आज प्याज, कल कुछ और
प्याज की मौजूदा तेजी सिर्फ एक खाद्य वस्तु की कीमत का मामला नहीं है। यह हमारी कृषि व्यवस्था की तैयारी की भी परीक्षा है। सरकार का बफर स्टॉक और ‘कांदा एक्सप्रेस’ तत्काल राहत दे सकते हैं। लेकिन लंबे समय के लिए यह जरूरी है कि बाजार में संभावित कमी का पहले अनुमान लगाया जाए और जरूरत वाले क्षेत्रों तक समय रहते आपूर्ति पहुंचाई जाए। क्योंकि फसल खेत में होना और उसका सही कीमत पर उपभोक्ता तक पहुंचना दो अलग बातें हैं। आज प्याज ने रसोई का बजट बिगाड़ा है। कल यही सवाल किसी दूसरी जरूरी खाद्य वस्तु को लेकर खड़ा हो सकता है। इसलिए असली चुनौती प्याज को सस्ता करना भर नहीं है। चुनौती ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें किसान की मेहनत का मूल्य भी सुरक्षित रहे और आम आदमी की थाली भी महंगाई के आगे मजबूर न हो।
