राजन पारकर
देश की राजनीति और व्यवस्था का असली चेहरा अक्सर प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, बल्कि घर की रसोई, नीलामी के बंद दरवाजे और राजनीतिक दलों की बंद कमरे वाली बैठकों में दिखाई देता है। एक तरफ गृहिणी की आय पर कानून की नजर है, दूसरी तरफ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की ऐतिहासिक विरासत करोड़ों में बिक रही है और तीसरी तरफ मुंबई भाजपा के भीतर की कथित तकरार ने पार्टी के अंदरूनी समीकरणों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कानून कहता है। आय है तो हिसाब दीजिए। इतिहास कहता है विरासत संभालिए। और राजनीति कहती है कुर्सी बचाइए! यही तो है इस लोकतंत्र की असली ‘अंदर की बात’।
गृहिणी के हाथ में बेलन, अब आयकर विभाग की नजर भी?
गृहिणी के हाथ में घर का बजट हो तो परिवार चलता है; लेकिन अगर उसी गृहिणी के नाम पर निवेश, ब्याज, किराया, पूंजीगत लाभ या दूसरा कर देय आय दिखाई देने लगे तो मामला परिवार की रसोई से निकलकर आयकर विभाग की फाइल में पहुंच सकता है। राजनीतिक गलियारों में मजाक चलता है कि देश में सबसे कठिन वित्त मंत्रालय अगर कोई चलाता है तो वह घर की गृहिणी है, बिना बजट भाषण के हर महीने महंगाई से मुकाबला करती है! मगर आयकर कानून भावनाओं से नहीं, आय के स्रोत और नियमों से चलता है।
इतिहास की कीमत लग सकती है,
विरासत की नहीं!
महात्मा गांधी की कलम से निकले ६८८ हस्तलिखित विचारों के संग्रह ने नीलामी की दुनिया में इतिहास रच दिया। १९ अगस्त २०२६ को सैप्रâॉनार्ट की नीलामी में यह संग्रह १६.२० करोड़ में बिका। रिपोर्टों के अनुसार, खरीदार भारत का ही है, लेकिन उसकी पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है। अब जरा सोचिए! जिस व्यक्ति ने जीवनभर सादगी का पाठ पढ़ाया, उसकी लिखावट के कुछ पन्नों की कीमत करोड़ों में पहुंच गई। गांधीजी के लिए शायद कागज पर लिखे शब्द धन नहीं थे वे विचार थे। लेकिन बाजार ने उन्हीं विचारों की कीमत १६.२० करोड़ लगा दी। यहीं इतिहास और बाजार आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि गांधी की विरासत पर भाषण देने वालों की कमी नहीं, लेकिन उस विरासत को वास्तव में सुरक्षित रखने वालों की पहचान अक्सर नीलामी के बाद होती है। अच्छी बात यह है कि रिपोर्टों के मुताबिक यह ऐतिहासिक संग्रह भारत में ही रहेगा। यानी कम से कम इस बार विरासत देश से बाहर नहीं गई। लेकिन सवाल दूसरा है कि क्या हम गांधी को सिर्फ नोटों पर रखेंगे या उनकी सोच को भी अपनी जिंदगी में रखेंगे। गांधी की वस्तुओं की कीमत १६.२० करोड़ हो सकती है; गांधी के विचारों की कीमत लगाना आज भी असंभव है।
बाहर कमल, अंदर कथित कलह?
मुंबई भाजपा अध्यक्ष अमित साटम की बैठक और उसके भीतर कथित तौर पर महापौर रितू तावडे तथा शिक्षा समिति अध्यक्षा राजेश्री शिरवाडकर के बीच हुई शाब्दिक तकरार ने राजनीतिक हलकों में कानाफूसी तेज कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच विवाद हुआ और बाद में अमित साटम ने हस्तक्षेप किया। अब सवाल यह है कि यह सिर्फ एक बैठक का तापमान था या आने वाले दिनों की राजनीति का थर्मामीटर। राजनीति में मतभेद कोई नई बात नहीं। मगर बंद कमरे में उठी आवाज जब बाहर तक सुनाई देने लगे, तब मामला सिर्फ ‘व्यक्तिगत मतभेद’ कहकर खत्म नहीं होता। मुंबई मनपा की राजनीति में हर पद के पीछे शक्ति-समीकरण होता है। महापौर की कुर्सी हो, समिति का अध्यक्ष पद हो या पार्टी के भीतर प्रभाव का सवाल, हर कुर्सी के आसपास कई अदृश्य दावेदार घूमते रहते हैं। सूत्रों के अनुसार, बैठक में कुछ मुद्दों को लेकर तनाव बढ़ा। चर्चा है कि मामला केवल दो नेताओं के बीच मतभेद तक सीमित नहीं, बल्कि मुंबई भाजपा के भीतर अलग-अलग शक्ति-केंद्रों के उभरने का संकेत भी हो सकता है। हालांकि सार्वजनिक रूप से पार्टी इसे सामान्य आंतरिक चर्चा बताए तो आश्चर्य नहीं होगा।
