-शीतल अवस्थी
-अनंत सूत्र के अपमान से छिनी सुख-समृद्धि; भगवान विष्णु की उपासना से कौंडिन्य ऋषि के जीवन में लौटे अच्छे दिन
प्राचीन काल में सुमंत नामक एक ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था। दोनों की सुशीला नाम की एक संस्कारी और धर्मपरायण पुत्री थी। कुछ समय बाद दीक्षा का निधन हो गया। सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया, लेकिन उसका व्यवहार सुशीला के प्रति अच्छा नहीं था।
विवाह योग्य होने पर सुशीला का विवाह कौंडिन्य ऋषि से कर दिया गया। विवाह के बाद जब सुशीला अपने पति के साथ उनके आश्रम जा रही थी, तब रास्ते में उसने नदी किनारे कुछ महिलाओं को पूजा करते देखा। वे लाल वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना कर रही थीं।
सुशीला ने उनसे इस व्रत के विषय में पूछा। महिलाओं ने बताया कि यह अनंत चतुर्दशी व्रत है। इस दिन भगवान अनंत की पूजा करके १४ गांठों वाला अनंत सूत्र बांधा जाता है। श्रद्धापूर्वक व्रत करने से विपत्तियां दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
सुशीला ने वहीं विधिपूर्वक अनंत भगवान की पूजा की और अपनी बाईं भुजा में अनंत सूत्र बांध लिया। इसके बाद वह कौंडिन्य ऋषि के साथ उनके आश्रम पहुंची। भगवान अनंत की कृपा से कुछ ही समय में उनके घर में धन-धान्य, पशुधन और सभी प्रकार की सुख-सुविधाएं आ गईं।
एक दिन कौंडिन्य ऋषि की दृष्टि सुशीला की भुजा में बंधे अनंत सूत्र पर पड़ी। उन्होंने पूछा कि यह कैसा धागा है। सुशीला ने बताया कि यह भगवान अनंत का पवित्र सूत्र है और उनकी कृपा से ही परिवार को सुख-समृद्धि मिली है।
कौंडिन्य ऋषि को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्हें लगा कि सुशीला इस सूत्र को उनके वशीकरण के लिए पहने हुए है। क्रोध में उन्होंने अनंत सूत्र तोड़कर अग्नि में डाल दिया। सुशीला ने तुरंत उसे आग से निकालकर दूध में रख दिया, लेकिन भगवान अनंत के प्रतीक का अपमान हो चुका था।
इसके बाद कौंडिन्य ऋषि की संपत्ति धीरे-धीरे नष्ट होने लगी। घर में कलह बढ़ा, पशुधन समाप्त हो गया और वे दरिद्र हो गए। तब सुशीला ने बताया कि यह विपत्ति अनंत सूत्र के अपमान के कारण आई है।
अपनी भूल का एहसास होने पर कौंडिन्य ऋषि भगवान अनंत की खोज में वन की ओर निकल पड़े। मार्ग में उन्हें फलों से लदा एक आम का वृक्ष दिखाई दिया, लेकिन कोई पक्षी उसका फल नहीं खा रहा था। आगे एक गाय और बछड़ा मिले, पर वे घास नहीं खा रहे थे। फिर दो सरोवर दिखाई दिए, जिनका जल आपस में मिलता था, लेकिन कोई जीव उसे पीता नहीं था। उन्हें एक गधा और हाथी भी मिले। कौंडिन्य ने सभी से भगवान अनंत का पता पूछा, मगर उत्तर नहीं मिला।
अंततः निराश होकर उन्होंने प्राण त्यागने का विचार किया। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण प्रकट हुए और उनका हाथ पकड़कर एक दिव्य गुफा में ले गए। वहां कौंडिन्य ने भगवान विष्णु को अनंत स्वरूप में देखा। वे उनके चरणों में गिर पड़े और अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी।
भगवान अनंत ने कहा कि मार्ग में दिखाई दिया आम का वृक्ष पूर्व जन्म का ऐसा विद्वान था, जिसने अपना ज्ञान किसी को नहीं दिया। गाय पृथ्वी का प्रतीक थी और बछड़ा धर्म का। दोनों सरोवर आपस में दान करने वाली बहनें थीं, जिन्होंने दूसरों की सहायता नहीं की। गधा क्रोध और हाथी अहंकार का प्रतीक था।
भगवान ने कौंडिन्य से कहा कि वे १४ वर्षों तक अनंत चतुर्दशी का व्रत करें। इससे उनके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे और अंत में उन्हें विष्णुलोक की प्राप्ति होगी। कौंडिन्य ऋषि ने पत्नी सुशीला के साथ श्रद्धापूर्वक व्रत किया। भगवान अनंत की कृपा से उनके घर में फिर सुख, शांति और समृद्धि लौट आई।
यह कथा संदेश देती है कि अहंकार और क्रोध में आकर आस्था का अपमान नहीं करना चाहिए। गलती का पश्चाताप, संयम और सच्ची भक्ति मनुष्य को दोबारा उन्नति के मार्ग पर ला सकते हैं।
