मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : तो ‘आजाद’ भी गुलाम नजर आने लगते हैं!

रुख-ए-सियासत : तो ‘आजाद’ भी गुलाम नजर आने लगते हैं!

-तौसीफ कुरैशी
-जब सियासी चालें उल्टी पड़ें

सियासत में सबसे मुश्किल वक्त वह होता है, जब चाल-चलने वाला हर चाल के बाद यह सोचता रह जाए कि आखिर गोटी सीधी क्यों नहीं बैठ रही? भारतीय जनता पार्टी के सामने कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा दिखाई देता है। जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन के बाद पैदा हुई राजनीतिक बेचैनी और सरकार के कठोर रुख ने जिस बहस को जन्म दिया, वह अब केवल छात्रों तक सीमित नहीं रह गई है। सत्ता के रवैये, बेरोजगारी, शिक्षा और युवाओं के भविष्य जैसे सवालों ने विपक्ष को बोलने की नई जमीन दे दी है। राजनीति में तस्वीर बदलते देर नहीं लगती। कल तक जिस राहुल गांधी को सत्ता समर्थक विमर्श में हल्का साबित करने की कोशिश होती थी, आज उन्हीं राहुल गांधी की छात्र-युवा राजनीति में बढ़ती सक्रियता पर जवाब देने की जरूरत महसूस होती दिख रही है। और जब अपना मैदान कमजोर लगे तो विपक्ष के घर से निकले किसी पुराने खिलाड़ी को मैदान में उतार देना राजनीति की पुरानी परंपरा है। यहीं से ‘आजाद’ और ‘गुलाम’ वाला व्यंग्य पैदा होता है।
कांग्रेस में लंबा राजनीतिक जीवन बिताने वाले, लेकिन वर्तमान में भाजपा के साथ खड़े नेताओं में से किसी का बयान अगर राहुल गांधी को ‘थ्री-व्हीलर’ और नरेंद्र मोदी को अमेरिकी एफ-१६ बताने लगे, तो सवाल बयान की भाषा से ज्यादा उसकी राजनीतिक जरूरत पर उठता है। मुकाबले को विमान बनाम तिपहिया बताने से मुकाबला खत्म नहीं हो जाता। राजनीति में जनता ही असली रनवे है और फैसला वहीं होता है। मगर इतिहास का एक छोटा-सा व्यंग्य यह भी है कि हथियार की चमक और युद्ध का परिणाम हमेशा एक ही चीज नहीं होते। एफ-१६ का नाम सुनते ही अगर कोई यह मान ले कि सामने वाला स्वत: हार गया, तो उसे ईरान-अमेरिका टकरावों और आधुनिक युद्ध में ड्रोन तथा मिसाइलों की बदलती भूमिका का पूरा संदर्भ भी देखना चाहिए। युद्ध हो या राजनीति सिर्फ हथियार का नाम परिणाम तय नहीं करता। और यही बात सियासत पर भी लागू होती है।
अगर राहुल गांधी ‘थ्री-व्हीलर’ हैं तो फिर सत्ता को उनकी आवाज का जवाब देने के लिए इतनी राजनीतिक ऊर्जा क्यों लगानी पड़ रही है? अगर उनकी कोई हैसियत नहीं तो उनके हर बयान पर प्रतिक्रिया क्यों? अगर छात्र आंदोलन मामूली है तो उसके बाद पैदा हुई राजनीतिक बेचैनी इतनी बड़ी क्यों दिखाई दे रही है? सियासत में असली संकट तब शुरू होता है, जब सत्ता को अपने पक्ष में चल रही कहानी पर भरोसा नहीं रहता और कहानी बदलने के लिए नए-नए किरदार खोजने पड़ते हैं। कभी-कभी हालात इतने प्रतिकूल होते हैं कि तीर निशाने पर लगने के बजाय निशाना ही बदल जाता है। और जब मौसम खराब हो तो एफ-१६ हो या थ्री-व्हीलर सवाल वाहन का नहीं, रास्ते का होता है।

सत्यमेव जयते..!

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