मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत : संविधान और लोकतंत्र रक्षा की लड़ाई

रुख-ए-सियासत : संविधान और लोकतंत्र रक्षा की लड़ाई

तौसीफ कुरैशी

लोकतंत्र में दोस्ती बुरी चीज नहीं होती। समाज को जोड़ने के लिए, नफरत की दीवारों को गिराने के लिए और इंसान को इंसान से मिलाने के लिए संवाद जरूरी है। अगर कोई सांसद मुसलमानों से यह अपील करता है कि वे अपने हम वतनी भाइयों से दोस्ती बढ़ाएं, उनके सुख-दुख में शामिल हों, तो इस सलाह में अपने आप में कोई बुराई नहीं है। भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का आधार ही यही रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीति केवल दोस्ती के सहारे चलती है या उसके लिए साहस और संघर्ष भी चाहिए? आज देश का एक बड़ा तबका यह महसूस करता है कि जब उसके साथ भेदभाव, अन्याय या हिंसा की घटनाएं होती हैं, तब बहुत से नेता खामोश दिखाई देते हैं। चुनाव के समय ही क्यों वह इन समुदायों की याद करते हैं, लेकिन कठिन समय में उनकी आवाज सुनाई नहीं देती। ऐसे में जब वही नेता सामाजिक मेल-मिलाप का संदेश देते हैं, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या यह सलाह सिद्धांतों से प्रेरित है या राजनीतिक जरूरतों से? सच्चाई यह है कि आम मुसलमान ने पिछले वर्षों में केवल अपने लिए नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक सौहार्द के लिए भी संघर्ष किया है। उसने अदालतों के दरवाजे खटखटाए, सड़कों पर शांतिपूर्ण विरोध किए और अनेक मुश्किलों का सामना किया। इस संघर्ष में कई ऐसे लोग भी रहे, जिन्होंने बिना किसी राजनीतिक लाभ की अपेक्षा के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।
यही कारण है कि समाज अब केवल भाषण नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता देखना चाहता है। वह यह देखना चाहता है कि कौन नेता सत्ता की परवाह किए बिना अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है और कौन केवल चुनावी मौसम में सक्रिय दिखाई देता है। हिंदू-मुस्लिम एकता भारत की जरूरत है, लेकिन यह एकता सम्मान और समानता की बुनियाद पर खड़ी होनी चाहिए। दोस्ती तब मजबूत होती है जब उसके साथ विश्वास जुड़ा हो, और विश्वास तब पैदा होता है जब नेतृत्व कठिन समय में भी सच बोलने का साहस दिखाए।
देश को जोड़ने की लड़ाई में संवाद भी चाहिए और संघर्ष भी। लेकिन संघर्ष का सम्मान किए बिना केवल दोस्ती का संदेश अधूरा लगता है। जनता अब नारे नहीं, चरित्र देखना चाहती है, भाषण नहीं, प्रतिबद्धता देखना चाहती है। लोकतंत्र में आखिरकार वही नेतृत्व टिकता है, जो लोगों के साथ केवल मंच पर नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में भी खड़ा दिखाई दे और फिलहाल ऐसा कोई नेता राहुल गांधी के अलावा दूसरा नजर नहीं आता है वे लोगों की, दबे-कुचले समाज की, दलितों की, अति पिछ़ड़ों की, हिंदुओं और मुसलमानों की और उस हिंदुस्थान की जो हमारे पुर्खों ने हमें हमें दिया था उनकी आवाज है। उसी देश को जीवित करने के लिए जननायक राहुल गांधी के नेतृत्व में आगे चलकर अपने देश को सोने की चिड़ियां बनाएं, जिसे संघियों की नफरत ने बहुत डेमेज कर दिया है। सत्यमेव जयते

शहर चमके, मगर गांव पीछे छूटे!
देश की राजनीति में कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनसे बचकर नहीं निकला जा सकता। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या १९९१ के बाद अपनाए गए उदारीकरण के रास्ते ने भारत को वास्तव में मजबूत बनाया या विकास की दौड़ में करोड़ों लोगों को पीछे छोड़ दिया?
उदारीकरण के समर्थक बताते हैं कि अर्थव्यवस्था बढ़ी, विदेशी निवेश आया, शहर चमके, नए उद्योग खड़े हुए। यह बात अपनी जगह सही हो सकती है। लेकिन उतना ही बड़ा सच यह भी है कि इस विकास का बड़ा हिस्सा कुछ हाथों में सिमटता गया। गगनचुंबी इमारतें खड़ी हुईं, मगर खेतों से पलायन भी बढ़ा। अरबपतियों की सूची लंबी हुई, मगर मजदूर और किसान की चिंता भी उतनी ही गहरी होती गई। पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने जिस मिश्रित अर्थव्यवस्था की कल्पना की थी, उसका मूल विचार था कि राज्य केवल चौकीदार नहीं होगा, बल्कि जनता के जीवन में भागीदार भी होगा। बड़े उद्योग भी होंगे, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र भी मजबूत रहेगा। बाजार भी होगा, मगर समाज की कमजोर आबादी को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी भी सरकार की होगी। यही कल्याणकारी राज्य की अवधारणा थी।
२००४ के बाद एक दिलचस्प स्थिति बनी। एक तरफ आर्थिक सुधारों का दबाव था, दूसरी तरफ सामाजिक अधिकारों की मांग। उसी दौर में सूचना का अधिकार, ग्रामीण रोजगार गारंटी और खाद्य सुरक्षा जैसे कानून सामने आए। इन योजनाओं ने करोड़ों गरीब परिवारों को यह अहसास कराया कि लोकतंत्र केवल वोट डालने का नाम नहीं, बल्कि अधिकार हासिल करने का माध्यम भी है। आज बहस फिर उसी मोड़ पर लौटती दिखाई दे रही है। विपक्ष के कई नेता, विशेषकर जननायक राहुल गांधी, आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और संपत्ति के केंद्रीकरण को प्रमुख मुद्दा बना रहे हैं। सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या सरकार की भूमिका केवल संपत्तियों के निजीकरण तक सीमित रहनी चाहिए या उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा में भी निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए। देश की सार्वजनिक संपत्तियां किसी एक सरकार की निजी जागीर नहीं होतीं। वे पीढ़ियों की मेहनत, करदाताओं के धन और राष्ट्रीय संकल्प से निर्मित होती हैं। सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन राष्ट्र की संपत्ति राष्ट्र की ही रहती है। आखिर विकास का असली पैमाना शेयर बाजार की ऊंचाई नहीं, बल्कि उस नागरिक का जीवन है जो सबसे नीचे खड़ा है। अगर उसकी थाली भरी है, उसके बच्चे पढ़ रहे हैं और उसका भविष्य में भरोसा है, तभी विकास सार्थक है। वरना चमकते महलों के बीच बढ़ती हुई खामोशी भी एक दिन इतिहास का बड़ा सवाल बन जाती है। सत्यमेव जयते

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