आकाश!

आकाश में कभी शून्यता
मैं नहीं देख पाई।
दिन के उजाले में
जीवित दिखता सारा ब्रह्माण्ड।
निशा में दिखती
आकाश की वैभवता,
अनगिनत तारों की चमक।
लगता, खिलखिला रहे हों,
कभी टूटते, कभी कहीं जा जुड़ते।
इतनी हलचल, फिर शून्यता कहां?

आकाश का विशाल विस्तार
मुझे चकित नहीं करता।
मैंने सपनों, कामनाओं का
कभी क्षितिज नहीं देखा।
कुवांरी कन्या के
सपने सदा असीमित होते हैं।

कहां नाप ली गई है
आकाश की गहराई?
गहराई विरह पीड़ा की,
कोई कब नाप पाया?
मां की ममता को
कब चीर सीना नापा है?

आकाश को गर्व होता है
अपनी निर्मलता पर।
ऐसी निर्मलता पर मुझे
भी नहीं कोई संशय।

यही निर्मल कोमलता
देख पाई मैं।
दशरथ, जनक, दधीचि,
मार्कंडेय, धाय पन्ना के
त्याग, परोपकारी व्यवहार में।

हां, यह मानना पड़ेगा,
यह आकाश ही है,
जिसने अमावस के दिन
शशी-रवी दोनों को थाम लिया साथ में।

बेला विरदी

अन्य समाचार