सामना संवाददाता / नागपुर
मुंबई के उपनगर मागाठाणे में झुग्गी-झोपड़ियों के विध्वंस पर अब सरकार पोस्ट-डिमोलिशन रिसर्च मोड में आ गई है। मंत्री उदय सामंत ने घोषणा की कि पूरे मामले की गहन जांच 60 दिनों में पूरी की जाएगी—यानि झुग्गियां भले ही मिनटों में टूटी हों, लेकिन सच्चाई अब दो महीने में निकलेगी!
सदस्य प्रकाश सुर्वे के सवाल का जवाब देते हुए सामंत ने बताया कि बृहन्मुंबई नगर निगम ने अदालत के आदेश पर कार्यवाही की थी। अब इसके बाद सरकार ने एक नई जांच समिति गठित करने का फैसला कर लिया है, जिसकी अध्यक्षता अतिरिक्त मुख्य सचिव करेंगे। सरकारी भाषा में इसे “जांच” कहते हैं, व्यंग्य की भाषा में इसे “अब पता लगाएं कि किसने क्या किया, क्यों किया और कैमरे बंद क्यों थे” कहते हैं।
सामंत ने बताया कि विवादित भूमि 2020 में शैलाजी इंफ्रास्ट्रक्चर को दी गई थी। अब सवाल यह उठ रहा है कि 1995 से पहले बनी झुग्गियां सुरक्षित थीं या नहीं? अगर थीं, तो उनको गिराने का आदेश किस ‘अदृश्य हाथ’ ने दिया?
सरकार ने संकेत दिया है कि अगर संरक्षण नियम लागू पाए गए, तो झुग्गीवासियों को राहत दी जाएगी।
सरकारी राहत का मतलब—पहले घर तोड़ो, फिर मुआवजे पर बैठकें करो, फिर जांच करो, फिर नई समिति बनाओ! इसके अलावा, विध्वंस के दौरान बाउंसरों के इस्तेमाल पर भी खास जांच होगी।
यानी अब पता चलेगा कि झुग्गियां तोड़ने गए लोग कर्मचारी थे या फिटनेस सेंटर के नए-नए जॉइन किए हुए मेंबर!
जब तक जांच चल रही है, तब तक किसी भी रहिवासी झुग्गी का विध्वंस नहीं किया जाएगा। यह घोषणा सुनकर कई झुग्गीवासियों ने राहत की सांस ली, क्योंकि फिलहाल 60 दिनों के लिए घर सुरक्षित और सरकार के लिए 60 दिनों तक जवाब देने की जरूरत नहीं। इस चर्चा में भास्कर जाधव और मनीषा चौधरी ने भी भाग लिया, लेकिन झुग्गियां केवल उन लोगों को याद रखती हैं जो उन्हें गिराते हैं या बचाते हैं, चर्चा करने वालों को नहीं।
