मुख्यपृष्ठस्तंभकहानी अनकही : सहारा नाम से नहीं, निभाने से बनता है!

कहानी अनकही : सहारा नाम से नहीं, निभाने से बनता है!

कई घरों में दो बच्चे होते हैं, लेकिन उनके लिए सोच एक जैसी नहीं होती। कुछ घरों में फर्क सिर्फ परवरिश का नहीं होता, सोच का होता है। किसी को सहारा मान लिया जाता है और किसी से सिर्फ समझदारी की उम्मीद रखी जाती है। अवंतिका और अनंत भी ऐसे ही दो नाम थे, एक ही घर में पले-बढ़े, लेकिन मां-बाप की नजर में दोनों की जगह अलग थी।
अनंत घर का बेटा था, इसलिए उसे हमेशा घर का सहारा माना गया। उसकी पढ़ाई, उसके पैâसले उसके सपने…, सब कुछ पूरे विश्वास के साथ आगे बढ़ाया गया। वहीं अवंतिका से ज्यादा उम्मीदें नहीं रखी गईं। उसे बस इतना कहा गया, `जितना हो सके पढ़ लो, फिर घर ही तो संभालना है।’ लेकिन कई बार जिससे कोई उम्मीद ही नहीं होती, वही सबसे ज्यादा निभा जाता है। अवंतिका ने कभी शिकायत नहीं की, बस खुद को साबित करती रही। अवंतिका ने चुपचाप पैâसला किया, वो अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ेगी। घर की जिम्मेदारियों के साथ, अपने सपनों को भी साथ लेकर चलेगी। कभी थकी, कभी टूटी लेकिन रुकी नहीं। वहीं अनंत जिसे हमेशा सहारा समझा गया था, उसे कभी जिम्मेदारी का असली मतलब समझाया ही नहीं गया। धीरे-धीरे वो अपने रास्तों में उलझता चला गया, घर से दूर, सोच से भी दूर। समय बदला। परिस्थितियां बदलीं और एक दिन ऐसा आया जब घर को सच में सहारे की जरूरत थी।
तब वही अवंतिका, जिससे कोई उम्मीद ही नहीं थी, सबसे ज्यादा मजबूती से खड़ी थी।
तब समझ आया, सहारा नाम से नहीं बनता, निभाने से बनता है। औलाद बेटा या बेटी नहीं होती, औलाद वो होती है जो वक्त आने पर साथ खड़ी रहे। और शायद जिंदगी का सबसे सच्चा फलसफा यही है, जिसे हम कम समझते हैं, वही सबसे ज्यादा निभा जाता है।

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