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प्रकृति का रौद्र रूप

पहाड़ का पानी पहाड़ की जवानी
पहाड़ के काम नहीं आती।
पानी ढलानों में बह जाता है और पेट की खातिर जवानी विस्थापित हो जाती है।
प्रकृति कभी-कभी पहाड़ों से रुष्ट हो जाती है।
यही हो रहा बीते कई वर्षों से।
उत्तर भारत के रमणीय पर्वतीय स्थल
भीषण क्रोध का शिकार हुए।
झेलम की बाढ़, मंडी में बादल फटने की घटना
बाबा केदारनाथ की दुखांत घटना जैसे
कल की हो बात।
और आज धराली, हर्शील में बनी अस्थाई झील ने ढा दिया कहर।
कुदरत के क्रूर खेल में अनगिनत
मानव जीवन प्राण को खो दिए,
घर, खेत, खलिहान, पशुधन से धो बैठे हाथ।
अविरल बरसते मेघ आपदा बन टूटे, सड़कें, पगडंडियां, गांव सब बह गए।
नींवें पड़ी ढीली, भवन चरमरा कर गिर पड़े।
कट गया संबंध अन्य स्थलों से।
भूख, प्यास, वर्षा, ठंड से मनुष्य और पशु
दारुण दुख सह रहे।
कभी-कभी तो सतत बहती
नदियों का विकराल रूप सामने आता।
तोड़ देती तटबंधों को।
सभी सेतु बहा ले जाती।
यहां कुदरत थी, कभी प्यार लुटाती।
यहीं सौम्य सुंदर मनोहारी पहाड़ी जनजीवन
प्रकृति की गोद बैठ सरल जीवन जीता था।
आज प्रकृति के कोप का हो शिकार परेशानी में पड़ रहा।
चहुं ओर माटी क्षरण, गिरते वृक्ष
अवरुद्ध होते मार्ग, लंबी कतारें लगती वाहनों की,
लंबे समय के लिए लगते जाम।
पर्यटन के नाम हुड़दंग मचाते पर्यटक।
स्वर्ग सा आनंद देता पहाड़ी वातावरण
अब कष्टकारी होता जा रहा।
वरुण देव कुछ दिन शांत रहें।
लोगों का जीवन पूर्ववत सुखमय हो जाए।
बेला विरदी।

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