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ट्रंप की मीडिया को धमकी!.. मीडिया की घटती स्वायत्तता और लोकतंत्र पर गहराता संकट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मीडिया को वाइट हाउस से निकालने की धमकियां देना केवल एक नेता का गुस्सा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर बढ़ते संस्थागत दबाव की बानगी है। ट्रंप का यह रवैया नया नहीं है; अपने भाषणों, रैलियों और बयानों में वे लगातार आलोचनात्मक मीडिया घरानों को निशाना बनाते रहे हैं। लेकिन यह संकट सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर स्वतंत्र पत्रकारिता को दबाने की एक खतरनाक प्रवृत्ति बन चुका है।
वैश्विक स्तर पर सिकुड़ती मीडिया की आजादी
‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (आरएसएफ) की ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ की रिपोर्ट दर्शाती है कि दुनिया भर में पत्रकारों के लिए काम करना जोखिम भरा होता जा रहा है। अमेरिका भी इस वैश्विक गिरावट से अछूता नहीं है, जहां राजनीतिक दबाव और मीडिया घरानों पर नियंत्रण के प्रयासों के कारण अमेरिका की रैकिंग गिरकर ६४वें स्थान पर आ गई है। रूस, चीन, और मध्य पूर्व के कई देशों में तो निष्पक्ष पत्रकारिता करना जान हथेली पर रखने जैसा है।
भारत में भी हालात चिंताजनक
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में भी मीडिया की स्वायत्तता को लेकर परिस्थितियां सुखद नहीं हैं। आरएसएफ की वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत १८० देशों में फिसलकर १५७वें स्थान पर पहुंच गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्वतंत्र पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ कड़े कानूनों का इस्तेमाल, न्यायिक उत्पीड़न, वित्तीय दबाव और सोशल मीडिया पर संगठित ट्रोलिंग ने रिपोर्टिंग के माहौल को कठिन बना दिया है।

लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
पत्रकारिता का मूल कर्तव्य सत्ता से तीखे सवाल पूछना और जनहित के मुद्दों को सामने लाना है। जब राष्ट्राध्यक्ष या सरकारें मीडिया के एक्सेस को रोकने, संस्थाओं को ‘जनता का दुश्मन’ बताने या वित्तीय व कानूनी हथकंडों से मीडिया का गला घोंटने का प्रयास करती हैं, तो यह सीधे तौर पर जनता के ‘मानने और जानने के अधिकार’ पर हमला होता है। स्वतंत्र प्रेस के बिना कोई भी लोकतंत्र सही अर्थों में पारदर्शी और जवाबदेह नहीं रह सकता। यदि मीडिया की स्वायत्तता पर यह लगाम इसी तरह कसती रही, तो यह वैश्विक लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

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