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अंडरवर्ल्ड सीक्रेट : ‘जिंदा है’ सुनील सावत्या! … मुंबई अंडरवर्ल्ड का ‘किलिंग मशीन’

जय सिंह

मुंबई अंडरवर्ल्ड का इतिहास कई खौफनाक नामों से भरा पड़ा है। लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनकी दहशत हर गली-नुक्कड़ तक पैâल जाती है। सुनील सावंत उर्फ ‘सावत्या’ भी उनमें से एक था। एक ऐसा गैंगस्टर, जिसने गिरगांव की तंग गलियों से उठकर दाऊद इब्राहिम की किलिंग मशीन बनकर दुनिया के सबसे खतरनाक अपराध जगत में अपनी जगह बनाई।
१५ साल की उम्र से ही वह इलाके में दुकानों से हप्तावसूली करता था स्कूल में भी वह उन लड़कों का लीडर था, जो वहां पढ़ने कम, गुंडागर्दी करने ज्यादा आते थे।
गिरगांव से निकला ‘दहशत का उस्ताद’
गिरगांव में उसका नाम ऐसा चलता था कि स्थानीय गुंडे ही नहीं, कई बड़े छोटे गैंग भी उससे दूरी बनाकर रखते थे। उसी समय भायखला में रमा नाईक का दबदबा था। एक ऐसा डॉन, जिसे सुनील सावत्या अपना आदर्श मानता था। रमा नाईक की शत्रुता और दहशत, और उसकी ‘सीधी-सादी पर घातक स्टाइल’ ने सावत्या को बहुत प्रभावित किया। अपने नाम का सिक्का जमाने के लिए सावत्या ने रमा नाईक के साथ काम करना शुरू कर दिया।
दाऊद की नजर इस नए ‘हिटमैन’ पर टिक गई
तब तक दाऊद इब्राहिम मुंबई छोड़कर विदेश जा चुका था, पर मुंबई अंडरवर्ल्ड पर पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए उसे ऐसे लोगों की जरूरत थी, जो निडर हों, मर्डर करने से न घबराएं और गैंग के लिए कुछ भी कर गुजरें। उसकी नजर पड़ी-सुनील सावत्या पर। दाउद के लोगों ने सावत्या को डी कंपनी से जुड़ने का ऑफर दिया, लेकिन वह किसी मुस्लिम डॉन के अंडर में काम नहीं करना चाहता था इसलिए उसने मना कर दिया।
तस्करों से वसूली… और पहली बड़ी हत्या
सावत्या दाऊद को मनाकर खुद तस्करों और हवाला कारोबारियों से वसूली का कारोबार करने लगा! इसी सिलसिले में एक तस्कर सत्यवान परब ने जब हफ्ता देने से साफ मना कर दिया तो सावत्या ने उसे दिन-दहाड़े मार गिराया। यह उसका दूसरा हाई-प्रोफाइल मर्डर था, जिसने मुंबई अंडरवर्ल्ड में उसकी पहचान को और मजबूत कर दिया।
गिरफ्तारी और रमा नाईक से बड़ी निराशा
इस हत्या के बाद मुंबई पुलिस ने सावत्या को गिरफ्तार कर लिया। उसे पूरा भरोसा था कि रमा नाईक उसे छुड़ाने आगे आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह उसके लिए पहला झटका था और इसी ‘धोखे’ से उसके जीवन का मोड़ बदल गया। जब दाऊद को पता चला कि उसने सावत्या की जमानत करवाई और सावत्या डी कंपनी में शामिल हो गया। हालांकि, दाऊद इब्राहिम ने उसकी जमानत एक रणनीति के तहत करवाई थी। एक खूंखार हत्यारे को अपने गिरोह का हथियार बनाने के लिए। इसके बाद सावत्या ने पूरी तरह डी कंपनी का दामन थामा।
पठान गैंग पर हमले का ‘स्पेशल मिशन’
दाऊद और पठान गैंग के बीच युद्ध जैसा माहौल था। पठान गैंग का मुख्यालय था नागपाड़ा। पठान गिरोह से जुड़े दो लोग पप्पू और छेनू ने दाऊद की नाक में दम कर रखा था। उसी दौरान दाऊद ने सावत्या और उसके साथी अनिल परब को पप्पू पठान और छेनू पठान को ठिकाने लगाने का ऑर्डर दिया वो भी उनके इलाके नागपाड़ा में घुस कर मारने का। यह मिशन सावत्या के ‘किलिंग मशीन’ टैग का सबसे बड़ा कारण बना। और दोनों ने मिलकर दोनों का गेम बजा दिया।
छोटा राजन से दुश्मनी और मौत
१९९३ के बाद दाऊद और छोटा राजन का गठजोड़ टूट गया। दोनों गैंगों में खुली लड़ाई छिड़ गई थी। इस जंग में कई बड़े नाम खत्म हो गए और सुनील सावत्या भी छोटा राजन के निशाने पर आ गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उसे दुबई में ही मार दिया गया उसकी लाश कभी बरामद नहीं हुई और उसकी मौत आज भी ‘मिस्ट्री’ मानी जाती है। कुछ लोगों का कहना है कि उसे किसी होटल के बाहर गोलियों से छलनी किया गया तो कुछ कहते हैं कि उसे चुपचाप गायब कर दिया गया। जिस तरह दाऊद के ‘जिंदा’ होने और उसके ‘मारे’ जाने की खबरें गाहे-बगाहे सुर्खियां बनती रहती हैं। इस तरह लंबे अरसे पूर्व तकिया की मौत को लेकर भी चर्चाएं होती रहती थीं। कई लोगों का मानना था कि उसने खुद को जानबूझकर गायब कर दिया।

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