ई राज
मध्य प्रदेश का सरकारी सिस्टम भी कभी-कभी ऐसी जादूगरी दिखाता है कि बड़े-बड़े जादूगर सोच में पड़ जाएं। इंदौर के खजराना इलाके से एक ऐसा ही `अकल्पनीय, अविश्वसनीय, अकथनीय’ कारनामा सामने आया है। यहां पिछले ६ साल से एक १०० बेड का सिविल अस्पताल चल रहा है, लेकिन ट्विस्ट यह है कि यह अस्पताल जमीन पर नहीं, सिर्फ सरकारी कागजों पर चल रहा है! जी हां, अनिल कपूर की `मिस्टर इंडिया’ की तरह यह अस्पताल भी पूरी तरह गायब है, पर इसका रसूख ऐसा है कि सिस्टम हिल रहा है। आइए देखते हैं इस अनोखे अस्पताल की कुंडली। कागज पर झकास, जमीन पर `ठेंगा’! तारीख पर तारीख, र्इंट न लगी एक भी अस्पताल की मंजूरी मिले ६ साल बीत गए। जमीन के विवाद में फाइलें तो खूब घूमीं, लेकिन मौके पर अस्पताल के नाम पर एक र्इंट तक नहीं रखी गई।
अस्पताल भले ही `अदृश्य’ हो, लेकिन यहां डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ के ८७ पद बकायदा स्वीकृत हैं। जब अस्पताल ही नहीं है, तो ट्रांसफर कहां हो रहा है? लेकिन सरकारी सिस्टम की महिमा अपरंपार है, इन ६ सालों में इन पदों पर अधिकारियों की पोस्टिंग भी हुई, ट्रांसफर भी हुए और हर महीने सैलरी का मैसेज भी `टिन-टिन’ करके मोबाइल पर आता रहा!
तो… डॉक्टर साहब इलाज कहां कर रहे हैं? अब आप सोच रहे होंगे कि जब अस्पताल ही नहीं है, तो ये ८७ लोग ड्यूटी कहा बजा रहे हैं? क्या हवा में स्टेथेस्कोप घुमा रहे हैं? विभाग ने दिमाग लगाया कि जब तक जमीन का लफड़ा सुलझता है, तब तक इन डॉक्टरों और नर्सों को इंदौर के दूसरे अस्पतालों (जैसे पीसी सेठी और हुकुमचंद अस्पताल) में `गेस्ट एक्टर्स और स्पेशल अपीरियंस’ की तरह तैनात कर दिया जाए। यानी, अस्पताल काल्पनिक है, लेकिन स्टाफ असली है!
