अरमान खान
भारत में एक स्टैंडअप कॉमेडियन ने मार्च में एक सामान्य इंस्टाग्राम रील पोस्ट किया, जो प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर विदेशी नेताओं से व्यवहार-गले लगना, बोलने में गड़बड़ाना, बेवजह हंसना की पैरोडी था।
कुछ सप्ताह बाद जब वीडियो पर व्यूज की संख्या लाखों में हो गई, इसे इंस्टाग्राम पर ब्लॉक कर दिया गया। उसी दिन एक्स पर अपने मीम और राजनीतिक व्यंग्य को लेकर कई लोकप्रिय अकाउंट भारत सरकार के दबाव में ब्लॉक किए गए। इनमें अमेरिका- ईरान युद्ध के कारण हुए रसोई गैस संकट से निबटने के सरकार के तरीके की आलोचना की गई थी या मोदी का मजाक बनाया गया था।
ऐसा लगता है कि व्यंग्य विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता के विमर्श को योजनाबद्ध तरीके से दबाने में मोदी सरकार का मुख्य निशाना बन गया है।
२०१४ में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से ही सरकार ने नागरिक आजादियों को खत्म किया है और समाज के सभी स्तरों पर अपनी पकड़ मजबूत की है, जिसमें पारंपरिक मीडिया शामिल है, जिसका सरकारी जवाबदेही मांगने का इतिहास रहा है। अब यह डिजिटल कॉमन्स पर शिकंजा कस रही है। इसके लिए कानूनी कार्रवाई की धमकी का हथियारीकरण किया जा रहा है, ताकि बड़ी टेक कंपनियां, जो भारत के विशाल उपयोगकर्ता वर्ग तक अपनी पहुंच बनाए रखना चाहती हैं, अनुपालन सुनिश्चित करें। एक्स, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म की दुनियाभर में पहुंच के कारण भारत में जो कुछ हो रहा है, उसे वैश्विक चिंता बनाती है। मोदी सरकार ऑनलाइन अभिव्यक्ति को रोकना चाहनेवाले अन्य देशों के लिए एक संभावित टेंपलेट बना रही है।
भारत सरकार का मुख्य हथियार सूचना प्रौद्योगिकी कानून है। वर्ष २००० में बना कानून अधिकारियों को वह ऑनलाइन सामग्री हटाने की ताकत देता है, जो भारतीय संप्रभुता, सुरक्षा, कानून व्यवस्था या विदेशी संबंधों के लिए खतरा बन सकती है।
कुछ वर्षों से इसका इस्तेमाल प्रशासकों द्वारा ऐसी सामग्री हटाने के लिए किया जा रहा है, जो आलोचनात्मक होती है। मोदी सरकार ने अधिनियम में संशोधनों की शृंखला के जरिए इसे कड़ा बनाया है और इसके इस्तेमाल की मात्रा तेजी से बढ़ी है। उनकी सरकार ने अब और नए संशोधन प्रस्तावित किए हैं, जिनका लक्ष्य सामान्य इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को निशाना बनाना है जो समाचारों और करेंट अफेयर्स से संबद्ध सामग्री पोस्ट या साझा करते हैं।
इसका मतलब है कि एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में मैं अगर मोदी की नीतियों की आलोचना करते हुए इंस्टाग्राम पर रील डालता हूं तो वह पोस्ट और शायद मेरा अकाउंट भी ब्लॉक किया जा सकता है। प्लेटफॉर्म और मुझे भी कानूनी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और इंटरनेट प्रâीडम फाउंडेशन ने चेताया है कि संशोधनों का भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गहरा असर होगा।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने के सत्तारूढ़ पार्टी के प्रयासों का यह विस्तार ही है। एक समय के जीवंत पारंपरिक मीडिया को डरा दिए जाने के बाद ब्लॉगर, यूट्यूब कंटेंट क्रिएटर, स्वतंत्र पत्रकार और सामान्य इंटरनेट उपयोगकर्ता बचे हैं, जो सरकार की जवाबदेही तय करने में आए खालीपन को कुछ हद तक भरते हैं। अब, हमें भी निशाने पर लिया जा रहा है।
२०२१ में सरकार ने ट्विटर को उन अकाउंट को बंद करने के निर्देश दिए, जो कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के व्यापक विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में मोदी की आलोचना कर रहे थे। कानून अंतत: वापस लिए गए। दो साल बाद सरकार ने मोदी की आलोचना करनेवाली बीबीसी डॉक्यूमेंट्री की ऑनलाइन पहुंच ब्लॉक की।
हाल में पुलिसिंग को इंटेंसिफाई किया गया है। पिछले साल पुलिस ने एक १९ वर्षीय छात्र को गिरफ्तार किया क्योंकि उसने मई २०२५ में भारत-पाकिस्तान संघर्ष को लेकर सरकारी नैरेटिव पर सवाल करने वाली पोस्ट साझा की थी और पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया से लोकप्रिय व्यंग्यकारों को हटाने जैसे मामले सामने आए हैं।
यह समाज में सिहरन पैदा करनेवाला है और लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या बोलने का जोखिम उठाया जाना चाहिए। कई लोगों को लगने लगा है, नहीं।
खतरा खासकर मेरे जैसे मुस्लिमों के लिए ज्यादा है, जिन्हें मोदी के हिंदू कट्टरपंथी भारत में अपनी देशभक्ति साबित करने का बहुत दबाव का सामना करना पड़ता है भले सत्तारूढ़ पार्टी उनके मताधिकार कमजोर कर रही हो या हाशिए पर धकेल रही हो। जब भी मैं इंस्टाग्राम पर कोई राजनीतिक पोस्ट साझा करता हूं, हमेशा मेरे अभिभावकों का फोन आता है, उन्हें चिंता सताती है कि कानूनी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
इस लेख समेत, मेरा लिखा हर शब्द डर से सना होता है। अन्य कई की तरह मैं भी सोशल मीडिया पर कम बोलने लगा हूं। हमारी आवाज दब रही है।
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूरी तरह खत्म नहीं की जा सकी है। राजनीतिक विपक्ष ने अपनी मजबूती को साबित किया जब २०२४ आम चुनाव में मोदी की पार्टी ने अपना संसदीय बहुमत खो दिया और एक दिन मोदी भी जाएंगे ही। लेकिन भविष्य की अधिक उदार सरकारें भी शायद खामोशी का माहौल बनानेवाली मशीनरी के इस्तेमाल से नहीं बच पाएंगी।
और जो भारत में हो रहा है, केवल भारत में ही रहे, ऐसा जरूरी नहीं है। दुनियाभर में ऑनलाइन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दबाव में है, अमेरिका जैसे लोकतंत्र में भी जहां ट्रंप प्रशासन ने लगातार आलोचनात्मक समाचार कवरेज और व्यंग्यात्मक सामग्री को दबाने की कोशिश की है और जहां सिलिकॉन वैली के अधिकारियों ने राष्ट्रपति को खुश करने की चाहत दर्शाई है। भारत दिखाता है कि इसका नतीजा क्या होता है: दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में भी, जब लोग खुद को व्यक्त करने से डरते हैं तो वे ऐसा नहीं करते।
