मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाबड़ी दूर निकल आए हैं हम

बड़ी दूर निकल आए हैं हम

बड़ी दूर निकल आए हैं हम
तरक्की की आस लेकर
अपनी ही जड़ें उखाड़ आए हम
कहने को तो सिर्फ सत्तर वर्ष ही हुए हैं
गुलामी की बेड़ियों से मुक्त हुए…आजाद हुए
परंतु हम क्रांतिकारियों की कुर्बानियां भुला बैठे हैं,
जैसे यूं ही सदियां बिताए बैठे हैं
अफसोस के साथ कहा किसी ने
बड़ी दूर निकल आए हैं हम…
आजादी का सिक्का उछाल कर
खूब जश्न मनाते हैं हम साल दर साल
छुट्टी के नशे में झूमें-नाचें,पतंग उड़ाते हैं,
ताश के पत्तों में रम जाते हैं…
बच्चों को पूछो अहमियत इस दिवस की
टका सा जवाब दे जाते हैं
हमें आम खाने से है मतलब, दाम क्यों कोई हमसे पूछे
गहरी सोच में पड़ गई मैं जवाब सुनकर
जाने कहां खड़े हैं हम, अपने ही आजाद मुल्क में!
सच ही कहा है किसी ने
बड़ी दूर निकल आए हैं हम।
थे वो ‘मां के लाल’ प्यारे (धरती मां के)
अपनी भी माताओं के ‘राज दुलारे’
लड़े एक होकर वो ऐसे, एक ही मां के पूत हों जैसे
कोई झलक अब उन वीरों की
आज किसी में भी हम देख पाते नहीं।
याद करो कुर्बानियां उनकी,
‘भाव भीनी श्रद्धांजलि’ अर्पित करो
उन अमर शहीदों को
आज की युवा पीढ़ी में राष्ट्रभक्ति का जज्बा भरो
देश से ही हम सुरक्षित हैं
अतः एकता और भाईचारे को बढ़ावा दो
तब दुनिया सारी जान जाएगी
बड़ी दूर निकल हम आए हैं।
-नैंसी कौर, नई दिल्ली

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