संतोषी रावत
यह एक ऐसा सवाल है जो सीधे हमारी जेब, सेहत और आने वाली नस्लों के भविष्य से जुड़ा है। जब हम भारत को ‘ग्लोबल डेटा हब’ बनाने का सपना देखते हैं, तो आर्थिक तरक्की की चमक के पीछे कुछ कड़वे सच छिप जाते हैं। इस बड़े बदलाव की सबसे भारी कीमत किसी बड़ी टेक कंपनी को नहीं, बल्कि भारत के आम नागरिक और यहां के पर्यावरण को चुकानी होगी। आइए समझते हैं कि यह कीमत किन रूपों में वसूली जा रही है।
सबसे पहली और बड़ी कीमत हमें पानी की किल्लत के रूप में चुकानी होगी। एक आम एआई डेटा सेंटर को चौबीसों घंटे ठंडा रखने के लिए हर दिन लाखों लीटर साफ पानी की जरूरत होती है। सर्वर्स से निकलने वाली भारी गर्मी को शांत करने के लिए कूलिंग सिस्टम के जरिए लगातार ठंडे पानी का एक चक्र चलाना पड़ता है। चिंता की बात यह है कि भारत के जिन शहरों में ये सेंटर्स तेजी से बन रहे हैं, वहां आम जनता पहले से ही पानी की भारी कमी से जूझ रही है। जब ये सेंटर्स जमीन से भारी मात्रा में भूजल खींचेंगे तो उसकी सीधी कीमत हमारे घरों के नल और किसानों के खेतों को चुकानी पड़ेगी।
दूसरी कीमत हमारी सेहत और पर्यावरण को चुकानी पड़ेगी। डेटा सेंटर्स को बिना रुके बहुत ज्यादा बिजली चाहिए होती है और भारत में आज भी ज्यादातर बिजली कोयले से बनती है। इसका सीधा मतलब है कि जितने ज्यादा डेटा सेंटर्स बनेंगे, उतना ज्यादा कोयला जलेगा। इससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ेगा, शहरों का तापमान बढ़ेगा और प्रदूषण का स्तर खतरनाक हो जाएगा। मुंबई और चेन्नई जैसे तटीय शहरों पर इसका असर मौसम में अचानक बदलाव और गर्मी के रूप में दिख रहा है। जब हवा जहरीली होगी, तो अस्पतालों का खर्च और बीमारियों की असली कीमत आम जनता को अपनी सेहत से चुकानी पड़ेगी।
इसके अलावा, जमीन और प्राकृतिक सुरक्षा कवच का भी भारी नुकसान हो रहा है। इन बड़े सेंटर्स को बनाने के लिए हजारों एकड़ जमीन की जरूरत होती है। शहरों के आस-पास की उपजाऊ जमीन या संवेदनशील तटीय इलाके, जैसे मैंग्रोव और दलदली जमीन, इसके लिए साफ किए जा रहे हैं। जब ये प्राकृतिक सुरक्षा कवच नष्ट होते हैं, तो बाढ़ और चक्रवात का खतरा बढ़ जाता है, जिसकी कीमत वहां रहने वाले गरीब और मध्यम वर्ग को अपने जान-माल से चुकानी पड़ती है।
तरक्की और तकनीक वक्त की मांग हैं, लेकिन इसके लिए आम जनता को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता। इस कीमत को कम करने के लिए सरकार और कंपनियों को कुछ कड़े कदम तुरंत उठाने होंगे। कंपनियों के लिए यह जरूरी किया जाना चाहिए कि वे साफ पानी की जगह एयर-कूलिंग या रीसाइकल किए गए पानी का ही इस्तेमाल करें। साथ ही, डेटा सेंटर्स को अपनी पूरी बिजली सौर या पवन ऊर्जा से हासिल करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य किया जाए। सरकार को स्थानीय पर्यावरण के नुकसान का कड़ा ऑडिट करना होगा और कंपनियों की जवाबदेही तय करनी होगी।
डिजिटल इंडिया का सपना तब तक सच्चा नहीं हो सकता, जब तक हमारी जमीन, पानी और हवा सुरक्षित न हों। अगर आज कंपनियों को खुली छूट मिली, तो कल इस ग्लोबल हब के तमगे की सबसे बड़ी और दर्दनाक कीमत हमारे बच्चे चुकाएंगे।
