-पेपर लीक, खाली पद और महंगी शिक्षा को एक व्यवस्था से जोड़ा
इंदौर। राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम केवल विद्यार्थियों से संवाद नहीं था। यह शिक्षा और रोजगार से जुड़ी अलग-अलग शिकायतों को एक राजनीतिक शब्द ‘सिस्टम’ के भीतर समेटने का प्रयास था। राहुल ने व्यवस्था को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि छात्रों की समस्याएं अब किसी एक परीक्षा, विश्वविद्यालय या भर्ती तक सीमित नहीं रह गई हैं।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने सरकारी पद खाली रहने, भर्तियां समय पर नहीं निकलने, परिणाम रोके जाने, संविदा नियुक्तियों और परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। पेपर लीक होने पर लाखों अभ्यर्थियों की वर्षों की तैयारी बेकार हो जाती है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों और परीक्षा एजेंसियों पर कार्रवाई अक्सर धीमी रहती है। राहुल ने इसी असमानता को व्यवस्था के विरुद्ध छात्रों के अविश्वास का आधार बताया।
कार्यक्रम में उठे छात्र मुद्दे
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का दूसरा निशाना शिक्षा का बढ़ता निजीकरण था। उनका तर्क था कि सरकारी शिक्षा कमजोर होने से विद्यार्थी महंगी कोचिंग और निजी संस्थानों पर निर्भर हो रहे हैं। डिग्री और प्रशिक्षण पर परिवारों का खर्च बढ़ रहा है, लेकिन रोजगार की गारंटी घटती जा रही है। इसीलिए उन्होंने शिक्षा, पूंजी और राजनीतिक सत्ता के गठजोड़ का आरोप लगाया।
सुरक्षा शर्तों का विवाद
कार्यक्रम से पहले पुलिस द्वारा लगाई गर्इं ३१ शर्तों ने राहुल के आरोपों को राजनीतिक धार दी। कोचिंग संचालकों से विद्यार्थियों की सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारी लेने को कहा गया। कांग्रेस ने इसे दबाव बताया, जबकि पुलिस और भाजपा ने राहुल की सुरक्षा तथा भीड़-प्रबंधन के लिए आवश्यक कदम कहा।
`सवाल पूछने का हक चाहिए’
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, आरएसएस प्रमुख, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और उद्योगपतियों को ‘सिस्टम’ की शीर्ष परत बताते हुए जो आरोप लगाए, उनके समर्थन में मंच से ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए। इसलिए इस हिस्से को स्थापित तथ्य नहीं, राजनीतिक आरोप ही माना जाएगा। फिर भी कार्यक्रम का महत्वपूर्ण संदेश साफ था, युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा; वह निष्पक्ष परीक्षा, पारदर्शी चयन और सवाल पूछने का अधिकार भी मांग रहा है। भारी उपस्थिति को चुनावी समर्थन मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन उसे छात्रों के भीतर बढ़ती बेचैनी का संकेत मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। राहुल ने इसी बेचैनी को ‘सिस्टम बनाम स्टूडेंट्स’ की राष्ट्रीय लड़ाई बनाने की कोशिश की है।
