मुख्यपृष्ठटॉप समाचारभाजपा-शिंदे गुट के ७० निर्विरोध विजयी उम्मीदवारों की होगी जांच!

भाजपा-शिंदे गुट के ७० निर्विरोध विजयी उम्मीदवारों की होगी जांच!

-मनपा आयुक्त, आरओ और पुलिस आयुक्त को चुनाव आयोग ने किया तलब

-पब्लिक बोली, एक्शन होगा या सिर्फ खानापूर्ति

सामना संवाददाता / मुंबई

महाराष्ट्र में मनपा चुनाव अब लोकतंत्र बनाम सत्ता की सीधी लड़ाई बनते जा रहे हैं। धमकी, दबाव और सौदेबाजी के जरिए उम्मीदवारों से नामांकन वापस कराए जाने और भाजपा शिंदे गुट के ७० उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने के मामले ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। विपक्ष के तीखे हमलों के बाद आखिरकार राज्य चुनाव आयोग को मजबूरन हरकत में आकर जांच का आदेश देना पड़ा है।
चुनाव आयोग ने इस गंभीर मामले में मनपा आयुक्त, रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) और पुलिस आयुक्तों को तलब कर लिया है। आयोग ने साफ किया है कि इतने बड़े पैमाने पर निर्विरोध विजय सामान्य नहीं है और इसकी सघन जांच की जाएगी। इस बारे में पब्लिक का सवाल है कि कोई एक्शन होगा भी या सिर्फ खानापूर्ति हो रही है?

धमकी और दबाव का खेल
विपक्ष का आरोप है कि सत्ता के दबाव में विपक्षी उम्मीदवारों को डराया गया, धमकाया गया, और कहीं-कहीं लालच देकर नामांकन वापस लेने पर मजबूर किया गया। इसी के चलते भाजपा–शिंदे गुट के दर्जनों उम्मीदवार बिना लड़े ही विजयी घोषित हो गए। विपक्ष ने दो टूक कहा है कि राज्य चुनाव आयोग सत्ताधारी महायुति का एजेंट बनकर काम कर रहा है और लोकतंत्र को कुचला जा रहा है।
शिवसेना ने उठाया सवाल
इस मामले में शिवसेना ने सवाल उठाया है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, समाजवादी नेता बैरिस्टर नाथ पै, वसंतदादा पाटील, यहां तक कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राम मनोहर लोहिया जैसे महान नेता भी कभी निर्विरोध नहीं चुने गए। तो फिर महायुति के शासन में अचानक इतने उम्मीदवार निर्विरोध कैसे? अगर चुनाव ही नहीं होंगे, तो मतदाता क्या सिर्फ तमाशबीन बनकर रह जाएगा?
जांच की समय सीमा तय नहीं!
हालिया मनपा-नपा चुनावों में नाम वापस लेने की आखिरी तारीख के खत्म होने के बाद सत्ताधारी महायुति के ७० उम्मीदवार विजयी घोषित किए गए। इस मामले में विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। इसके बाद चुनाव आयोग ने सभी स्थानीय प्रशासन से रिपोर्ट तलब की है। आयोग का कहना है कि जब सभी उम्मीदवार नाम वापस ले लेते हैं और एक ही उम्मीदवार बचता है, तो रिपोर्ट मंगवाना प्रक्रिया का हिस्सा है। जांच में यह देखा जाएगा कि क्या उम्मीदवारों पर दबाव था? क्या पुलिस-प्रशासन का दुरुपयोग हुआ? क्या सत्ता के इशारे पर नामांकन वापस कराए गए? हालांकि, आयोग ने यह भी कहा है कि जांच की कोई तय समय-सीमा नहीं है, लेकिन १५ जनवरी के मतदान और १६ जनवरी की मतगणना से पहले जांच पूरी करने की कोशिश होगी।
तो लोकतंत्र का बचना मुश्किल
इस मामले में पब्लिक का सवाल है कि आयोग की कार्रवाई होगी या फिर यह भी कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगी? अगर ७० निर्विरोध जीत पर भी सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो लोकतंत्र का बचना मुश्किल है।

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